सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय तटरक्षक बल (ICG) और केंद्र सरकार को लैंगिक भेदभाव के मुद्दे पर कड़ी चेतावनी दी है। शीर्ष अदालत ने महिला अधिकारी प्रियंका त्यागी को तुरंत स्थायी कमीशन देने की मांग की है और कहा है कि अगर सरकार फैसला नहीं लेती, तो अदालत खुद आदेश जारी करेगी।

  • सुप्रीम कोर्ट ने महिला अधिकारी प्रियंका त्यागी को स्थायी कमीशन न देने पर भारतीय तटरक्षक बल को फटकारा।
  • मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ ने केंद्र सरकार को दो सप्ताह के भीतर फैसला लेने का अल्टीमेटम दिया।
  • अदालत ने कहा कि यदि सरकार कार्रवाई नहीं करती है, तो न्यायपालिका खुद इस संबंध में आदेश जारी करेगी।

भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) डी.वाई. चंद्रचूड़ की अगुवाई में सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय तटरक्षक बल (ICG) में लैंगिक भेदभाव के खिलाफ एक ऐतिहासिक रुख अपनाया है। अधिकारी प्रियंका त्यागी द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवाई करते हुए, शीर्ष अदालत ने योग्य महिला अधिकारियों को स्थायी कमीशन देने से इनकार करने पर तटरक्षक बल और केंद्र सरकार की कड़ी आलोचना की। न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ ने स्पष्ट किया कि सैन्य प्रतिष्ठान पुरानी दलीलों के तहत महिलाओं को दरकिनार नहीं कर सकते।

प्रियंका त्यागी, जिन्होंने एक उत्कृष्ट सेवा रिकॉर्ड के साथ देश की सेवा की है, ने अनुकरणीय रिकॉर्ड के बावजूद स्थायी कमीशन से वंचित किए जाने के बाद अदालत का दरवाजा खटखटाया। उनकी याचिका ने उस प्रणालीगत भेदभाव को उजागर किया जहां समान या कम कार्यकाल वाले पुरुष अधिकारियों को नियमित रूप से स्थायी कमीशन दिया जाता था, जबकि महिला अधिकारियों को शॉर्ट-सर्विस कमीशन के बाद सेवानिवृत्त होने के लिए मजबूर किया जाता था।

तीखी सुनवाई के दौरान, मुख्य न्यायाधीश चंद्रचूड़ ने सरकार को चेतावनी दी कि यदि वे दो सप्ताह के भीतर त्यागी को उनका वैध कमीशन नहीं देते हैं, तो अदालत एक बाध्यकारी आदेश जारी करने में संकोच नहीं करेगी। सीजेआई ने टिप्पणी की, "आप अपने सार्वजनिक भाषणों में 'नारी शक्ति' की बात करते हैं, लेकिन आपके कार्य इसके बिल्कुल विपरीत हैं।"

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

भारतीय सशस्त्र बलों में लैंगिक समानता की लड़ाई लंबी और कठिन रही है। दशकों तक, महिलाओं को केवल शॉर्ट-सर्विस कमीशन तक ही सीमित रखा गया था, जिसका अर्थ था कि उन्हें पेंशन लाभ के बिना 10 से 14 वर्षों के बाद सेवानिवृत्त होना पड़ता था। यह स्थिति 2020 में तब बदली जब सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक बबीता पुनिया मामले में फैसला सुनाया कि भारतीय सेना में महिला अधिकारी अपने पुरुष समकक्षों के समान स्थायी कमीशन की हकदार हैं। इसके बाद नौसेना और वायुसेना के लिए भी ऐसे ही फैसले आए, लेकिन तटरक्षक बल इस बदलाव से पीछे भागता रहा।

सेना की शाखामहिलाओं के लिए स्थायी कमीशनस्थिति / ऐतिहासिक मामला
भारतीय सेनाहाँबबीता पुनिया मामला (2020)
भारतीय नौसेनाहाँएनी नागराजा मामला (2020)
भारतीय तटरक्षक बलन्यायिक समीक्षा के अधीनप्रियंका त्यागी मामला (2024)

यह क्यों महत्वपूर्ण है

BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि भारतीय तटरक्षक बल की लैंगिक-तटस्थ नीतियों को लागू करने में अनिच्छा, समुद्री और रक्षा बलों के भीतर एक गहरे प्रणालीगत प्रतिरोध को दर्शाती है। न्यायपालिका को बार-बार हस्तक्षेप करने के लिए मजबूर करके, ये संस्थान अपनी सार्वजनिक प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँचा रहे हैं और राष्ट्रीय मनोबल को प्रभावित कर रहे हैं।

"योग्य महिला अधिकारियों को स्थायी कमीशन से वंचित करना न केवल संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ भी एक समझौता है जो बिना किसी लैंगिक भेदभाव के सर्वश्रेष्ठ प्रतिभा की मांग करती है।"
क्या आप जानते हैं?: भारतीय वायु सेना भारतीय सशस्त्र बलों की पहली ऐसी शाखा थी जिसने महिलाओं को लड़ाकू भूमिकाओं में शामिल होने की अनुमति दी थी, जिसकी शुरुआत हेलीकॉप्टर और परिवहन पायलटों से हुई थी।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

प्रश्न 1: प्रियंका त्यागी कौन हैं?
उत्तर 1: प्रियंका त्यागी भारतीय तटरक्षक बल की एक महिला अधिकारी हैं, जिन्होंने अपने उत्कृष्ट सेवा रिकॉर्ड के बावजूद स्थायी कमीशन न मिलने पर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी।

प्रश्न 2: सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले पर क्या आदेश दिया?
उत्तर 2: सुप्रीम कोर्ट ने तटरक्षक बल और केंद्र सरकार को फटकार लगाते हुए दो सप्ताह का अल्टीमेटम दिया है कि वे उन्हें स्थायी कमीशन प्रदान करें, अन्यथा अदालत स्वयं इस संबंध में आदेश जारी करेगी।