हैदराबाद के ईडब्ल्यूएस लॉटरी में चयनित 4 साल के रेयांश को स्कूल ने दूरी मानदंड के कारण प्रवेश से इनकार किया, जिससे उनके पिता राजपाल चौहान ने न्यायालय का सहारा लिया। गुरुग्राम जिला न्यायालय ने स्कूल को 15 दिनों के भीतर बच्चे को दाखिला देने का आदेश दिया। यह मामला निजी स्कूलों में आरटीई नियमों के अनुपालन को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है।

  • रेयांश को ईडब्ल्यूएस लॉटरी में सीट मिली, पर स्कूल ने दूरी कारण से प्रवेश से इनकार किया।
  • राजपाल चौहान ने दो महीने की कानूनी लड़ाई के बाद जिला न्यायालय से जीत हासिल की।
  • न्यायालय ने स्कूल की नीति को "सामाजिक रूप से कमजोर वर्गों के बच्चों को शिक्षा से वंचित करने" वाली रणनीति बताया।

हैदराबाद के आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) लॉटरी में 29 अप्रैल को रेयांश को द श्री राम स्कूल अरावली में सीट आवंटित की गई थी। यह लॉटरी हरियाणा स्कूल शिक्षा विभाग द्वारा कंप्यूटरीकृत रूप से आयोजित की गई थी, जिसका उद्देश्य कमजोर वर्ग के बच्चों को निजी स्कूलों में प्रवेश दिलाना था।

हालांकि, स्कूल ने रेयांश के घर और स्कूल के बीच 3 किमी से अधिक दूरी को कारण बनाकर प्रवेश से इनकार कर दिया। यह निर्णय हरियाणा के "शिक्षा का अधिकार" नियमों के तहत निर्धारित पड़ोस-मानदंड को लागू करने के नाम पर किया गया था।

राजपाल चौहान, जो गुड़गांव के बेम्पुर खतोला में रहने वाले एक एकल आय अर्जक हैं, ने इस निर्णय को चुनौती देने के लिए न्यायालय का रुख अपनाया। उन्होंने पहले सिविल जज (जूनियर डिवीजन) में अंतरिम आदेश की मांग की, लेकिन 13 जुलाई को यह याचिका खारिज कर दी गई। इसके बाद उन्होंने जिला न्यायालय में अपील दायर की।

गुड़गांव के अतिरिक्त जिला न्यायाधीश डॉ. गगन गीता कौर ने 18 अगस्त को एक स्पष्ट आदेश जारी किया, जिसमें स्कूल को 15 दिनों के भीतर रेयांश को प्रवेश देने का निर्देश दिया गया। न्यायालय ने स्कूल की कार्यवाही को "सामाजिक रूप से कमजोर वर्गों के बच्चों को शिक्षा से वंचित करने" वाली रणनीति बताया और कहा कि राज्य की प्रवेश पोर्टल ने आवासीय पते के आधार पर स्कूल विकल्प स्वचालित रूप से नहीं दिखाए, जिससे प्रक्रिया में त्रुटि रही।