भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के महाप्रबंधक ने बताया कि पूर्वी चालुक्य राजवंश के राजा विष्णुवर्धन द्वितीय के पुणे तांबे की पट्टियों में गुंटूर का पहला लिखित उल्लेख मिला है, जो 669 ईस्वी में दर्ज है। यह खोज शहर के नाम के विकास को दिखाती है।

  • गुंटूर का पहला लिखित उल्लेख 669 ईस्वी में मिला
  • पुणे तांबे की पट्टियों में नाम के विभिन्न रूप दर्ज
  • प्राचीन लेखन मध्ययुगीन अंध्र प्रदेश की भाषा और राजनीति को उजागर करता है

खोज का विवरण

भारत के पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के एपिग्राफी निदेशक डॉ. के. मुनीरथन रेड्डी ने बताया कि पूर्वी चालुक्य राजवंश के राजा विष्णुवर्धन द्वितीय द्वारा अपने प्रथम राजवर्ष में जारी किए गए पुणे तांबे की पट्टियों में गुंटूर का उल्लेख पाया गया। ये पट्टियाँ 669 ईस्वी की हैं और शहर के नाम के कई रूपों—कुम्तुरु, गोम्तुरु, और गुंतुरु—को दर्ज करती हैं।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

10वीं शताब्दी की एड़ेरु तांबे की पट्टियों में भी शहर का नाम गोम्तुरु लिखा है। यह नाम 10वीं से 14वीं शताब्दी तक विभिन्न क्षेत्रीय शिलालेखों में निरंतर प्रयोग होता रहा, जो भाषा विज्ञान और राजनैतिक परिवर्तन को दर्शाता है।

Why This Matters

BozokMedia analysis shows that such epigraphical evidence is rare for urban centers in South India, offering scholars a concrete timeline to map socio‑political shifts under the Eastern Chalukyas and their successors.

"इन तांबे की पट्टियों ने गुंटूर के प्राचीन पहचान को प्रमाणित किया है, जिससे हमारी ऐतिहासिक समझ में नई दिशा मिली है," Dr. K. Munirathnam Reddy ने कहा।
Did You Know?: पुणे तांबे की पट्टियों को खोजने वाले टीम ने 2025 में ही इनका अनुवाद पूरा किया, जिससे इस खोज की गति अभूतपूर्व रही।

Frequently Asked Questions

प्रश्न 1: क्या यह खोज गुंटूर के प्राचीन शहर के आकार को बदलती है?

उत्तर: हाँ, यह संकेत देती है कि गुंटूर 7वीं शताब्दी से ही एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक केंद्र था।

प्रश्न 2: क्या अन्य दक्षिणी शहरों में भी ऐसी प्राचीन एपीग्राफी मिल सकती है?

उत्तर: संभावनाएँ उच्च हैं, क्योंकि कई चालुक्य राजाओं ने समान तांबे की पट्टियों का उपयोग किया था।