दिल्ली के बीजेपी प्रवक्ता प्रवीण शंकर कपूर ने निजी स्कूलों को हाई प्राइस वाली यूनिफॉर्म, जूते और बैग की बिक्री बंद करने का आग्रह किया। उन्होंने मध्य‑वर्गीय परिवारों पर बढ़ते वित्तीय बोझ को उजागर किया और 2028 से लागू होने वाली नीति का प्रस्ताव रखा।

  • निजी स्कूलों को 1 अप्रैल 2028 से महँगे यूनिफॉर्म की बिक्री बंद करनी होगी
  • स्कूल स्टोर्स में यूनिफॉर्म, जूते, बैग की विविधता घटेगी
  • पारिवारिक वित्तीय दबाव को कम करने के लिए 1 अप्रैल 2027 से नई नीति लागू

बीजेपी की नई मांग

दिल्ली के बीजेपी प्रवक्ता प्रवीण शंकर कपूर ने शुक्रवार को शिक्षा मंत्री आशीष सूड और मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता को एक औपचारिक पत्र लिखा। पत्र में उन्होंने निजी स्कूलों को दबाव डालने से रोकने का आग्रह किया, जहाँ माता‑पिता को स्कूल की इन‑हाउस दुकान से कई सेट यूनिफॉर्म, जूते और बैग खरीदने पड़ते हैं, अक्सर ‘अत्यधिक’ कीमतों पर।

वित्तीय बोझ का विस्तार

कापूर ने बताया कि मध्य‑वर्गीय परिवारों को एक ही छात्र के लिए ही दो‑तीन अलग‑अलग यूनिफॉर्म, खेल‑ड्रेस, एक्टिविटी ड्रेस और कम से कम तीन प्रकार के जूते खरीदने पड़ते हैं। यह खर्चा दो या अधिक बच्चों वाले परिवारों के लिए असहनीय बन गया है।

सरकारी प्रतिक्रिया और पिछला कदम

अप्रैल 2026 में दिल्ली सरकार ने पहले ही यह निर्देश जारी किया था कि निजी स्कूलों को अपने नोटिस बोर्ड, वेबसाइट और स्टोर पर स्पष्ट लिखित सूचना देनी होगी कि माता‑पिता किसी भी विक्रेता से यूनिफॉर्म, किताबें और स्टेशनरी खरीद सकते हैं। लेकिन कापूर का मानना है कि यह कदम पर्याप्त नहीं है।

कानूनी फ्रेमवर्क

कापूर ने दिल्ली शिक्षा अधिनियम के प्रावधानों का हवाला देते हुए कहा कि राज्य सरकार को स्कूलों में यूनिफॉर्म की विविधता घटाने और कीमतें किफायती रखने का अधिकार है। उन्होंने 1 अप्रैल 2028 से प्रभावी होने वाले दो मुख्य बिंदुओं की माँग की: (i) स्कूलों को कई सेट यूनिफॉर्म बेचने से रोकना, (ii) 1 अप्रैल 2027 से नए छात्रों को स्कूल‑द्वारा यूनिफॉर्म, जूते, किताबें व स्टेशनरी बेचने पर प्रतिबंध।

भविष्य की संभावनाएँ

कापूर ने संकेत दिया कि यदि सरकार इस दिशा में कदम उठाती है तो यह न केवल मध्य‑वर्गीय मतदाता वर्ग को राहत देगा, बल्कि राजनीतिक लाभ भी प्रदान करेगा। वह मानते हैं कि यह नीति स्कूल‑विभागीय असमानताओं को भी कम करेगी।

Why This Matters

BozokMedia analysis shows that the rising cost of school uniforms in Delhi’s private sector is turning education into a luxury commodity, potentially widening the socio‑economic divide among students.

"जब स्कूल यूनिफॉर्म की कीमतें बढ़ती हैं, तो यह न केवल आर्थिक बोझ बनता है, बल्कि बच्चों के मनोबल को भी प्रभावित करता है," कहती हैं शिक्षा नीति विशेषज्ञ डॉ. अंजलि मेहता।
Did You Know?: दिल्ली के कुछ प्री‑स्कूलों में यूनिफॉर्म की कीमतें 5,000 रुपये से लेकर 15,000 रुपये तक हो सकती है, जो औसत मध्य‑वर्गीय परिवार के बजट से कई गुना अधिक है।

Frequently Asked Questions

प्रश्न 1: क्या यह नीति सभी निजी स्कूलों पर लागू होगी?

उत्तर: हाँ, कापूर के प्रस्ताव में सभी मान्य निजी स्कूलों को शामिल किया गया है, बशर्ते वे दिल्ली शिक्षा अधिनियम के तहत पंजीकृत हों।

प्रश्न 2: क्या स्कूलों को पूरी तरह से यूनिफॉर्म बेचने से प्रतिबंधित किया जाएगा?

उत्तर: नहीं, स्कूल केवल अपने स्टोर में कई सेट और महँगे डिज़ाइन बेचने से रोकेंगे; वे मानक और किफायती यूनिफॉर्म की बिक्री जारी रख सकते हैं।