भारत के इथेनॉल‑ब्लेंडिंग योजना में सरकारी अनाज की कम कीमत पर डिस्टिलरी को सप्लाई करने की प्रक्रिया पर सवाल उठे हैं। यह लेख बताता है कि किसे मिल रही सब्सिडी, इसका आर्थिक‑सुरक्षा प्रभाव क्या है और नीति‑निर्माताओं को किन चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।
- सरकार MSP पर खरीदा धान, उसे चावल में बदलकर अर्द्ध‑कीमत पर डिस्टिलरी को देती है
- E20 लक्ष्य को जल्दी हासिल करने के लिये बड़ी वित्तीय सहायता दी गई
- भोजन‑बनाम‑ईंधन के ट्रेड‑ऑफ पर राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा पर असर का प्रश्न
इथेनॉल‑ब्लेंडिंग कार्यक्रम की वर्तमान स्थिति
भारत ने 20% इथेनॉल (E20) मिश्रण को अनिवार्य करने की योजना को 2025 में ही पूरा कर लिया, जबकि लक्ष्य 2030 था। इस तेज़ी के पीछे आसान कर्ज, बड़े‑पैमाने पर बायो‑इथेनॉल कारखानों की स्थापना और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कार्यक्रम (NFSP) के तहत खरीदे गए अनाज की उपलब्धता है।
सरकार ने न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर धान खरीदा, उसे मिलिंग करके चावल बनाया और फिर उस चावल को लगभग 40% कम कीमत पर इथेनॉल डिस्टिलरी को बेचती है। इस प्रक्रिया में किसान के लिए MSP का लाभ रहता है, पर टैक्सपेयर को दोहरी लागत उठानी पड़ती है – एक ओर अनाज की खरीद, दूसरी ओर चावल‑से‑इथेनॉल रूपांतरण के लिये सब्सिडी।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
1990 के दशक के अंत में भारत ने बायो‑इथेनॉल को ऊर्जा सुरक्षा का विकल्प बनाने की पहल की। 2018 में पहली बार E10 (10% इथेनॉल) को अनिवार्य किया गया, जिसके बाद 2020 में लक्ष्य को 20% तक बढ़ाने का प्रस्ताव आया। इस बीच, खाद्य सुरक्षा के लिये सार्वजनिक अनाज भंडार (FCI) का विस्तार भी जारी रहा, जिससे दो अलग‑अलग नीतियों के बीच टकराव स्पष्ट हुआ।
आर्थिक एवं सामाजिक प्रभाव
इथेनॉल उत्पादन के लिये उपयोग होने वाला चावल देश के खाद्य भंडार को घटा रहा है, जबकि लगभग 80 करोड़ लोग सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) पर निर्भर हैं। लखनऊ विश्वविद्यालय के प्रो. सुधीर पंवार ने कहा, "ऐसे देश में जहाँ लाखों को मुफ्त राशन की जरूरत है, अनाज को ईंधन में बदलना एक बड़ा त्याग है।" यह बयान राष्ट्रीय आर्थिक सलाहकार (CEA) वी. अनंत नागेश्वरन की चेतावनी को भी समर्थन देता है, जिन्होंने कहा कि "खाने बनाम ईंधन के ट्रेड‑ऑफ की लागत का सटीक आकलन आवश्यक है।"
Why This Matters
BozokMedia analysis shows that the subsidy loophole not only inflates fiscal deficits but also creates a vulnerable link between food security and fuel policy. If the government continues to prioritize E20 without addressing the underlying trade‑off, future food price volatility could undermine both political stability and foreign‑exchange savings.
"इथेनॉल के लिए चावल की कीमत घटाना दीर्घकालिक खाद्य सुरक्षा के लिये जोखिमपूर्ण कदम है," कृषि अर्थशास्त्री डॉ. रजत सिंह ने कहा।
Frequently Asked Questions
प्रश्न 1: क्या E20 लक्ष्य को जल्दी हासिल करना आर्थिक रूप से फायदेमंद है?
उत्तर: अल्पकालिक विदेशी मुद्रा बचत संभव है, पर दीर्घकालिक खाद्य सुरक्षा और सब्सिडी बोझ को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
प्रश्न 2: सरकार किस तरह से इस सब्सिडी को पुनर्संतुलित कर सकती है?
उत्तर: MSP‑से‑डिस्टिलरी प्राइस की अंतर को कम करके, या इथेनॉल उत्पादन के लिये वैकल्पिक कच्चे माल (जैसे गन्ना) को प्रोत्साहित करके।