मैक्वेरी की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में मानसून की स्थिति में काफी सुधार हुआ है, जिससे बारिश की कमी कम हुई है और खरीफ फसलों की बुवाई में तेजी आई है। इससे खाद्य मुद्रास्फीति के जोखिम भी कम होने की उम्मीद है।

  • जून में बारिश की कमी 35% थी, जो 19 अगस्त तक घटकर 12.6% रह गई।
  • खरीफ बुवाई में सुधार हुआ है, अब यह पिछले वर्ष की तुलना में केवल 2% कम है।
  • महाराष्ट्र और गुजरात में जलाशयों का जलस्तर 10 साल के औसत से अधिक या उसके बराबर है।

भारत के कृषि परिदृश्य में एक महत्वपूर्ण बदलाव देखा जा रहा है क्योंकि मानसून सत्र ने गति पकड़ ली है। वैश्विक ब्रोकरेज फर्म मैक्वेरी (Macquarie) की एक विस्तृत रिपोर्ट के अनुसार, बारिश की भारी कमी को लेकर शुरुआती चिंताएं, जिन्होंने खरीफ बुवाई के मौसम को बाधित करने की धमकी दी थी, अब कम होने लगी हैं। आंकड़ों से पता चलता है कि वर्षा के पैटर्न में मजबूत सुधार हुआ है, जो उपमहाद्वीप के लाखों किसानों के लिए एक बड़ी राहत है।

सांख्यिकीय बदलाव काफी स्पष्ट है। जून में, भारत को 35% की कुल वर्षा की कमी का सामना करना पड़ा था। हालांकि, 19 अगस्त तक यह अंतर काफी कम होकर 12.6% रह गया। हालांकि स्थिति पूरी तरह से सामान्य नहीं हुई है, लेकिन सुधार की दिशा सकारात्मक है, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि फसल स्थापना के लिए महत्वपूर्ण समय पूरी तरह से नष्ट नहीं हुआ है।

खरीफ खेती पर प्रभाव

बारिश में सुधार का सीधा असर बुवाई के आंकड़ों पर पड़ा है। सीजन की शुरुआत में व्यापक विफलता का डर था; हालांकि, 14 अगस्त तक, कुल खरीफ बुवाई क्षेत्र पिछले वर्ष की तुलना में केवल 2% कम था। यह जून के अंत की तुलना में एक बड़ा सुधार है, जब बुवाई में कमी 21% के चिंताजनक स्तर पर थी।

फसल श्रेणीपिछले वर्ष की तुलना में बुवाई स्थिति
कुल खरीफ-2% ( -21% से सुधार)
चावल (धान)-3.7%
मक्का-4%
दालें और तिलहनपिछले वर्ष के 1% के भीतर
गन्ना और कपासपिछले वर्ष के 1% के भीतर

जबकि चावल और मक्का में मामूली गिरावट देखी गई है, दालों, तिलहन और कपास की स्थिरता यह बताती है कि कृषि संकट व्यापक होने के बजाय कुछ विशिष्ट फसलों तक सीमित है।

यह क्यों महत्वपूर्ण है

BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि मानसून का स्थिर होना केवल एक कृषि जीत नहीं है, बल्कि एक व्यापक आर्थिक आवश्यकता है। एक ऐसे देश में जहां जीडीपी का एक बड़ा हिस्सा प्राथमिक क्षेत्र से जुड़ा है, स्थिर फसल पैदावार खाद्य कीमतों में वृद्धि को रोकती है। वर्षा की कमी में कमी सीधे तौर पर खाद्य मुद्रास्फीति के जोखिम को कम करती है, जो भारतीय रिजर्व बैंक और केंद्र सरकार के लिए एक निरंतर चुनौती रही है।

"बेहतर वर्षा और जलाशयों के स्वस्थ जल स्तर का समन्वय एक ऐसा सुरक्षा जाल बनाता है जो स्थानीय सूखे को राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा संकट में बदलने से रोकता है।"

इसके अलावा, जल बुनियादी ढांचे की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। महाराष्ट्र और गुजरात में जलाशयों का स्तर वर्तमान में उनके 10 साल के औसत के बराबर या उससे अधिक है। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और पंजाब जैसे प्रमुख कृषि केंद्रों में भंडार उनके संबंधित औसत के 80% से 100% के बीच हैं, जो सिंचाई के लिए एक महत्वपूर्ण बफर प्रदान करते हैं।

आशावाद के बावजूद, रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि बिहार और दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों की बारीकी से निगरानी करने की आवश्यकता है। वर्षा का स्थानिक वितरण असमान बना हुआ है, और इन क्षेत्रों में कोई भी लंबा सूखा अभी भी समग्र उत्पादकता को प्रभावित कर सकता है।

क्या आप जानते हैं?: दक्षिण-पश्चिम मानसून भारत की कुल वार्षिक वर्षा का लगभग 75% हिस्सा प्रदान करता है, जो इसे भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए सबसे महत्वपूर्ण जलवायु घटना बनाता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रश्न 1: जून के बाद से बारिश की कमी में कैसे बदलाव आया है?
जून में बारिश की कमी 35% थी, जो 19 अगस्त तक घटकर लगभग 12.6% रह गई है।

प्रश्न 2: इस सीजन में कौन सी फसलें सबसे अच्छा प्रदर्शन कर रही हैं?
दालें, तिलहन, गन्ना और कपास का प्रदर्शन पिछले वर्ष के स्तर के लगभग बराबर है।