राहुल गांधी ने पुणे में महिला सुरक्षा पर चर्चा करते हुए मनुस्मृति का हवाला दिया, जिससे भाजपा और कांग्रेस के बीच तीखा संघर्ष शुरू हो गया। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यंत और कई भाजपा नेताओं ने इसे हिन्दुस्तान की सांस्कृतिक विरासत के अपमान के रूप में खारिज किया।

  • राहुल गांधी ने मनुस्मृति को महिलाओं के दमन का कारण बताया
  • भाजपा ने इसे एंटी‑हिंदू और विदेशी विचारधारा कहा
  • विवाद ने महिला अधिकारों और धार्मिक ग्रंथों पर राष्ट्रीय बहस छेड़ दी

विरोधी दल के नेता राहुल गांधी ने पुणे में आयोजित ‘छात्रो की गूँज’ कार्यक्रम में महिलाओं की सुरक्षा और पितृसत्ता पर बात करते हुए मनुस्मृति का हवाला दिया, यह दावा करते हुए कि यह ग्रंथ महिलाओं को दमन करने की नीति को बढ़ावा देता है। इस टिप्पणी ने तुरंत ही भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और कांग्रेस के बीच तीखा टकराव उत्पन्न कर दिया।

भाजपा के वरिष्ठ नेता, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यंत ने गांधी की टिप्पणी को “भारतीय सांस्कृतिक विरासत का अपमान” कहा और इसे “विदेशी, मार्क्सवादी एजेंडा” का हिस्सा बताया। भाजपा सांसद डॉ. सुधांशु त्रिवेदी ने भी इस बात पर ज़ोर दिया कि ऐसी टिप्पणी सामाजिक विभाजन को बढ़ावा देती है।

कांग्रेस की प्रतिनिधि पंखुरी पाठक ने युवतीयों के साथ गांधी की बातचीत को “समावेशी संवाद” कहा, जबकि कई भाजपा नेताओं ने कांग्रेस के महिलाओं के अधिकारों के दृष्टिकोण पर प्रश्न उठाए, विशेषकर तलीक, शरिया और हिजाब जैसे मुद्दों को लेकर।

इतिहास में, मनुस्मृति को सामाजिक और कानूनी व्यवस्था के रूप में कई बार विवादों का सामना करना पड़ा है। 19वीं सदी में इस ग्रंथ को सामाजिक सुधार आंदोलन ने चुनौती दी, और स्वतंत्रता के बाद भी विभिन्न राजनीतिक दलों ने इसे अपने-अपने सिद्धांतों के अनुसार व्याख्यायित किया है। यह विवाद भारत में धर्म और राजनीति के आपसी संबंधों की जटिलता को फिर से उजागर करता है।

वर्तमान में, इस विवाद के कारण कई राज्यों में सार्वजनिक प्रदर्शन और सोशल मीडिया पर तीव्र बहस चल रही है। महिला अधिकार संगठनों ने इस मुद्दे को महिला सुरक्षा के व्यापक संदर्भ में उठाया है, जबकि कुछ रूढ़िवादी समूह इसे धार्मिक आहत मानते हैं।

भाजपा और कांग्रेस दोनों ही इस मुद्दे को अपने-अपने चुनावी रणनीति में उपयोग कर रहे हैं, जिससे आगामी राज्य और राष्ट्रीय चुनावों में यह विषय प्रमुख बना रहेगा।

Why This Matters

BozokMedia analysis shows that the Gandhi‑Manusmriti controversy could reshape voter sentiments on secularism versus cultural nationalism, influencing the political calculus ahead of the 2025 general elections.

"ऐसे धार्मिक ग्रंथों की सार्वजनिक चर्चा अक्सर सामाजिक विभाजन को तीव्र करती है, जिससे नीति‑निर्माण में संतुलन बनाना कठिन हो जाता है," दलील देते हैं राजनैतिक विज्ञान के प्रोफेसर डॉ. अंजलि सिंह।
Did You Know?: मनुस्मृति का पहला अनूदित संस्करण 19वीं सदी के अंत में ब्रिटिश प्रशासकों द्वारा किया गया था, जिससे इसकी व्याख्या में कई आयाम जुड़ गए।

Frequently Asked Questions

प्रश्न 1: क्या राहुल गांधी ने मनुस्मृति को पूरी तरह से नकारा?

उत्तर: उन्होंने यह कहा कि यह ग्रंथ महिलाओं के दमन को बढ़ावा देता है, लेकिन इसे पूरी तरह से हटाने की बात नहीं की।

प्रश्न 2: इस विवाद का अगले चुनावों पर क्या प्रभाव पड़ेगा?

उत्तर: विशेषज्ञों का मानना है कि यह मुद्दा वोटर बेस को दो हिस्सों में बाँट सकता है, जिससे दोनों पार्टियों को अपनी-अपनी रणनीति बदलनी पड़ेगी।