रूस के सुखोई Su-57 लड़ाकू विमानों को लेकर भारत के सामने एक बड़ा रणनीतिक सवाल खड़ा है। क्या भारत को रूस की उन्नत तकनीक का लाभ उठाना चाहिए या चीन की तरह ऐतिहासिक अवसर चूक जाना चाहिए?
- रूस ने भारत को Su-57 के साथ पूर्ण तकनीकी हस्तांतरण और सोर्स कोड का प्रस्ताव दिया है।
- चीन ने 1990 के दशक में सोवियत तकनीक का लाभ उठाकर अपनी सैन्य शक्ति को अभूतपूर्व रूप से बढ़ाया था।
- भारतीय वायु सेना वर्तमान में विमानों की कमी और AMCA के विलंब से जूझ रही है।
- Su-57 का अधिग्रहण भारत के हाइपरसोनिक और इंजन कार्यक्रमों के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है।
भारतीय वायु सेना (IAF) इस समय एक महत्वपूर्ण चौराहे पर खड़ी है। एक तरफ रूस के 5वीं पीढ़ी के Sukhoi Su-57 स्टील्थ फाइटर जेट्स का आकर्षक प्रस्ताव है, तो दूसरी तरफ स्वदेशी AMCA और पश्चिमी सहयोग जैसे विकल्प मौजूद हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को कम से कम दो स्क्वाड्रन Su-57 की खरीद पर विचार करना चाहिए ताकि चीन और पाकिस्तान (यदि वे J-35 प्राप्त करते हैं) के बीच बढ़ते स्टील्थ अंतर को पाटा जा सके।
हालाँकि, रक्षा मंत्रालय के भीतर मतभेद हैं। रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह ने हाल ही में संकेत दिया था कि भारत का 'सुखोई के नए संस्करणों' को खरीदने का कोई इरादा नहीं है। इसके विपरीत, भारत ने Future Combat Air System (FCAS) में शामिल होने की दिशा में कदम बढ़ा दिए हैं, जो छठी पीढ़ी के विमानों के विकास की ओर एक बड़ा संकेत है।
क्यों यह महत्वपूर्ण है
BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि यह मामला केवल एक लड़ाकू विमान खरीदने का नहीं है, बल्कि यह 'तकनीकी संप्रभुता' का मामला है। इतिहास गवाह है कि जब 1991 में सोवियत संघ का पतन हुआ, तो चीन ने उस अस्थिरता का फायदा उठाया। चीन ने रूसी वैज्ञानिकों को आकर्षित किया और लाइसेंस प्राप्त तकनीक को उन्नत सैन्य शक्ति में बदल दिया। आज चीन के J-20 और J-16 जैसे विमान उसी सोवियत नींव पर खड़े हैं।
भारत को तकनीक के हस्तांतरण से बचना नहीं चाहिए, बल्कि उसे आत्मसात कर स्वयं को विकसित करना चाहिए।
रूस वर्तमान में अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों और आर्थिक दबाव के कारण अत्यधिक लचीला रुख अपना रहा है। राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने भारत को बिना किसी सीमा के Su-57 का प्रस्ताव दिया है, जिसमें AESA रडार आर्किटेक्चर, मिशन सॉफ्टवेयर और स्थानीय उत्पादन शामिल है। यह अवसर भारत के Advanced Medium Combat Aircraft (AMCA) के लिए इंजन की कमी को दूर करने में भी सहायक हो सकता है।
तकनीकी तुलना: Su-57 बनाम अन्य विकल्प
| विशेषता | Sukhoi Su-57 | Rafale (France) | AMCA (India) |
|---|---|---|---|
| पीढ़ी | 5वीं पीढ़ी | 4.5 पीढ़ी | 5वीं पीढ़ी (प्रस्तावित) |
| स्टील्थ क्षमता | उच्च (Stealth) | मध्यम | उच्च (लक्ष्य) |
| तकनीकी हस्तांतरण | उच्च संभावना | सीमित | स्वदेशी विकास |
यदि भारत Su-57 के माध्यम से रूस के साथ साझेदारी करता है, तो यह केवल विमानों तक सीमित नहीं रहेगा। यह सहयोग भारत के हाइपरसोनिक मिसाइल कार्यक्रम, परमाणु संचालित पनडुब्बी डिजाइन और अगली पीढ़ी के ड्रोन प्रणालियों के लिए नए द्वार खोल सकता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. क्या Su-57 वास्तव में एक स्टील्थ विमान है?
आलोचकों का कहना है कि यह पूरी तरह स्टील्थ नहीं है, लेकिन इसका रडार क्रॉस सेक्शन (RCS) राफेल से कम है और यह उन्नत तकनीक से लैस है।
2. भारत Su-57 क्यों नहीं खरीदना चाहता?
मुख्य कारणों में तकनीकी विश्वसनीयता पर संदेह और पश्चिमी देशों (जैसे FCAS) के साथ बढ़ते रक्षा सहयोग शामिल हैं।