आलूरी सीताराम राजू जिले के चिंतापल्ली में 64 एकड़ राजस्व भूमि को लेकर आदिवासी किसानों और वन विभाग के बीच गंभीर विवाद खड़ा हो गया है। किसान पीढ़ी दर पीढ़ी खेती करने और वैध दस्तावेज होने का दावा कर रहे हैं।
- चिंतापल्ली के कांदुलागड़ी और चिन्नगड्डा गांवों के 34 आदिवासी किसान विवाद में शामिल हैं।
- विवाद का मुख्य कारण 64 एकड़ राजस्व भूमि पर स्वामित्व का दावा है।
- किसान राजस्व विभाग द्वारा जारी पट्टा और पासबुक का प्रमाण के रूप में उपयोग कर रहे हैं।
- वन विभाग और राजस्व विभाग के बीच समन्वय की कमी से मामला और उलझ गया है।
आंध्र प्रदेश के आलूरी सीताराम राजू जिले के अंतर्गत आने वाले चिंतापल्ली पंचायत के कांदुलागड़ी और चिन्नगड्डा गांवों में एक गंभीर भूमि विवाद उत्पन्न हो गया है। लगभग 34 आदिवासी किसान वर्तमान में 64 एकड़ राजस्व भूमि पर अपने अधिकारों को लेकर संघर्ष कर रहे हैं, जिसे वन विभाग भी अपना बता रहा है। किसानों ने अब आदिवासी कल्याण विभाग से इस मामले की जिला स्तरीय संयुक्त जांच कराने की पुरजोर मांग की है।
किसानों का तर्क है कि वे पीढ़ियों से इन जमीनों पर खेती कर रहे हैं। उन्होंने स्पष्ट किया है कि उनके पास राजस्व विभाग द्वारा किए गए सर्वेक्षणों के बाद जारी किए गए वैध पट्टा और पासबुक मौजूद हैं। किसानों के अनुसार, उनकी पूर्वजों से प्राप्त यह भूमि कानूनी रूप से उनके परिवार के सदस्यों के नाम पर दर्ज (म्यूटेशन) है।
विवाद की शुरुआत और बढ़ता तनाव
विवाद की जड़ें जनवरी 2026 में तब गहरी हुईं जब वन विभाग के अधिकारियों ने कथित तौर पर अनुबंध श्रमिकों को किसानों के खेतों में सीमेंट के सीमा स्तंभ (boundary pillars) लगाने के लिए लगाया। किसानों का कहना है कि जब उन्होंने इस बारे में पूछा, तो श्रमिकों ने बताया कि ये स्तंभ टेलीफोन संबंधी कार्यों के लिए हैं। संदेह होने पर किसानों ने उन स्तंभों को हटा दिया, जिसके बाद वन विभाग ने दावा किया कि वह भूमि वन क्षेत्र के अंतर्गत आती है।
इस घटना के बाद स्थिति और बिगड़ गई। किसानों ने आरोप लगाया कि कुछ किसानों के खिलाफ चिंतापल्ली पुलिस स्टेशन में मामले दर्ज किए गए, जिसके जवाब में किसानों ने वन अधिकारियों के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई।
BozokMedia विश्लेषण: प्रशासनिक विफलता का संकेत
BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि यह मामला केवल भूमि विवाद नहीं है, बल्कि राजस्व और वन विभागों के बीच समन्वय की भारी कमी को दर्शाता है। जब राजस्व अधिकारियों ने एक पूर्व सर्वेक्षण में वन विभाग को सूचित किया कि विवादित भूमि आदिवासी किसानों की है, तब भी वन विभाग द्वारा नोटिस जारी करना प्रशासनिक तालमेल के अभाव को उजागर करता है।
प्रशासनिक रिकॉर्ड और जमीनी हकीकत के बीच का यह अंतर अक्सर हाशिए पर रहने वाले समुदायों के अधिकारों का हनन करता है।
हाल ही में, विवाद तब और बढ़ गया जब वन अधिकारियों ने कथित तौर पर सिंचाई के लिए किए जा रहे बोरवेल कार्यों को रोक दिया। हालांकि 22 अगस्त को मंडल स्तर पर एक सर्वेक्षण किया गया था, लेकिन किसानों का कहना है कि इससे समस्या का कोई समाधान नहीं निकला और न ही भूमि अधिकारों की स्पष्ट स्थिति सामने आई।
Frequently Asked Questions
प्रश्न 1: किसान किन दस्तावेजों के आधार पर भूमि पर दावा कर रहे हैं?
उत्तर: किसान राजस्व विभाग द्वारा जारी किए गए पट्टा और पासबुक को अपना मुख्य प्रमाण मान रहे हैं।
प्रश्न 2: विवाद का मुख्य कारण क्या है?
उत्तर: मुख्य विवाद 64 एकड़ भूमि पर राजस्व विभाग (किसानों के पक्ष में) और वन विभाग के बीच स्वामित्व के दावे को लेकर है।