सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्जल भुयान ने देश के शीर्ष न्यायालय में कानूनी शिक्षाविदों (Distinguished Jurists) की नियुक्ति की आवश्यकता पर जोर दिया है। उन्होंने लोकतांत्रिक समाज में असहमति को सहन करने की क्षमता को एक संवैधानिक मूल्य बताया।

  • जस्टिस भुयान ने अनुच्छेद 124(3) के तहत 'प्रतिष्ठित न्यायविदों' की नियुक्ति की मांग की।
  • उन्होंने कहा कि 76 वर्षों से इस संवैधानिक प्रावधान का उपयोग नहीं किया गया है।
  • छात्र विरोधों के बीच उन्होंने असहमति को सहन करने और लोकतांत्रिक मूल्यों के महत्व पर जोर दिया।

नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी, दिल्ली के 2026 एलएलएम बैच के 13वें दीक्षांत समारोह को संबोधित करते हुए जस्टिस उज्जल भुयान ने भारतीय न्यायपालिका के ढांचे में एक महत्वपूर्ण बदलाव का सुझाव दिया। उन्होंने इस बात पर गहरी चिंता व्यक्त की कि भारतीय संविधान के लागू होने के 76 वर्षों बाद भी, किसी भी कानूनी शिक्षाविद या 'प्रतिष्ठित न्यायविद' को सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के रूप में नियुक्त नहीं किया गया है।

यह बयान ऐसे समय में आया है जब देश के कई प्रमुख राष्ट्रीय कानून विश्वविद्यालयों के छात्र मुख्य न्यायाधीश (CJI) की टिप्पणियों के विरोध में प्रदर्शन कर रहे हैं और उन्हें अपने दीक्षांत समारोहों में आमंत्रित करने से इनकार कर रहे हैं। जस्टिस भुयान ने स्पष्ट किया कि जिस तरह सवाल पूछने की आजादी महत्वपूर्ण है, उसी तरह अलग दृष्टिकोण या असहमति को सहन करने की क्षमता भी उतनी ही जरूरी है।

लोकतंत्र और असहमति का मूल्य

जस्टिस भुयान ने कहा कि एक लोकतांत्रिक समाज इस विचार पर नहीं बनाया जा सकता कि हर कोई एक जैसा सोचेगा। उन्होंने जोर देकर कहा कि सहिष्णुता केवल व्यक्तिगत शिष्टाचार नहीं, बल्कि एक संवैधानिक मूल्य है। उनके अनुसार, लोकतंत्र तब सार्थक होता है जब अलग-अलग आवाजें सह-अस्तित्व में हों और उन्हें गरिमा के साथ सुना जाए।

BozokMedia विश्लेषण दर्शाता है कि जस्टिस भुयान का यह आह्वान न्यायपालिका के 'विविधीकरण' की दिशा में एक बड़ा कदम हो सकता है। वर्तमान में, सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश मुख्य रूप से बार (वकीलों) या उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों के बीच से चुने जाते हैं। कानूनी शिक्षाविदों को शामिल करने से न्यायालय में अकादमिक गहराई और सैद्धांतिक स्पष्टता आएगी, जो जटिल संवैधानिक व्याख्याओं में सहायक होगी।

"सुप्रीम कोर्ट केवल एक न्यायिक निकाय नहीं है, बल्कि यह राष्ट्र का नैतिक, कानूनी और संवैधानिक विवेक है, जो तकनीकी बारीकियों से ऊपर है।"

जस्टिस भुयान ने उस तर्क को खारिज कर दिया जिसमें कहा जाता है कि शिक्षाविदों के पास व्यावहारिक अनुभव की कमी होती है। उन्होंने तर्क दिया कि अनुच्छेद 124(3) का उद्देश्य ही बेंच को प्रतिभाशाली और विविध विशेषज्ञों के साथ समृद्ध करना था। उन्होंने स्पष्ट किया कि एक 'न्यायविद' केवल एक प्रसिद्ध वकील या न्यायाधीश नहीं होता, बल्कि वह व्यक्ति भी हो सकता है जो कानून के क्षेत्र में गहरा ज्ञान और कौशल रखता हो।

ऐतिहासिक रूप से, भारत में इस प्रावधान की अनदेखी या तो भारतीय अकादमिक जगत की गहराई पर संदेह के कारण हुई या फिर इस प्रावधान को गंभीरता से नहीं लिया गया। जस्टिस भुयान के अनुसार, इस कारण कई प्रतिभाशाली विद्वान देश की सर्वोच्च अदालत में सेवा देने के अवसर से वंचित रह गए।

क्या आप जानते हैं?: भारतीय संविधान का अनुच्छेद 124(3) राष्ट्रपति को यह शक्ति देता है कि वह किसी ऐसे व्यक्ति को सुप्रीम कोर्ट का जज नियुक्त कर सकें जिसे वह एक 'प्रतिष्ठित न्यायविद' मानता हो, भले ही वह वकील या जज न हो।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रश्न 1: 'प्रतिष्ठित न्यायविद' (Distinguished Jurist) से क्या तात्पर्य है?
उत्तर: यह वह व्यक्ति है जो कानून के क्षेत्र में अत्यधिक ज्ञान, विशेषज्ञता और विद्वत्ता रखता हो, चाहे वह पेशेवर रूप से वकील या न्यायाधीश रहा हो या न रहा हो।

प्रश्न 2: जस्टिस भुयान ने असहमति पर क्या कहा?
उत्तर: उन्होंने कहा कि लोकतंत्र की परिपक्वता इस बात से झलकती है कि वह कठिन या अलोकप्रिय विचारों के प्रति कैसी प्रतिक्रिया देता है।