तेलंगाना कृषि और किसान कल्याण आयोग द्वारा गठित एक विशेषज्ञ पैनल ने चेतावनी दी है कि लघु और प्रमुख सिंचाई विभागों का विलय 'विनाशकारी' रहा है, जिससे 95% किसान बोरवेल पर निर्भर हो गए हैं। रिपोर्ट में लघु सिंचाई टैंकों की तत्काल बहाली और अतिक्रमण हटाने की मांग की गई है।
- 2020 में लघु और प्रमुख सिंचाई विभागों के विलय से 44,170 छोटे जल निकायों की गंभीर उपेक्षा हुई।
- लघु सिंचाई स्रोतों के अंतर्गत आने वाले लगभग 90-95% किसानों को सिंचाई के लिए पानी नहीं मिल रहा है।
- पैनल ने लघु सिंचाई प्रणाली की पुन: स्थापना और पंचायत राज निकायों को जल उपकर (Water Cess) वसूलने का अधिकार देने की सिफारिश की है।
मुख्यमंत्री ए. रेवंत रेड्डी को सौंपी गई एक विस्तृत रिपोर्ट में, तेलंगाना कृषि और किसान कल्याण आयोग द्वारा गठित विशेषज्ञों की समिति ने राज्य की जल प्रबंधन रणनीति में एक गंभीर विफलता को उजागर किया है। रिपोर्ट में निष्कर्ष निकाला गया है कि राज्य गठन के बाद लघु सिंचाई (MI) विभाग का प्रमुख सिंचाई विभाग के साथ विलय 'विनाशकारी' साबित हुआ है, जिसके परिणामस्वरूप छोटे जल निकायों की निगरानी पूरी तरह समाप्त हो गई।
संकट का पैमाना बहुत बड़ा है, राज्य के 44,170 लघु सिंचाई टैंक गाद (siltation), प्रदूषण और अवैध अतिक्रमणों से बुरी तरह प्रभावित हैं। पैनल के अनुसार, इंजीनियरिंग पर्यवेक्षण की कमी के कारण जल उपयोग दक्षता में भारी गिरावट आई है, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों के अधिकांश किसान पारंपरिक टैंकों को छोड़कर महंगे और अस्थिर बोरवेलों पर निर्भर हो गए हैं।
यह क्यों महत्वपूर्ण है
BozokMedia के विश्लेषण से पता चलता है कि यह केवल एक प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि एक पारिस्थितिक आपदा है। ग्रामीण तेलंगाना में भूजल पुनर्भरण (Groundwater Recharge) के लिए लघु सिंचाई टैंक प्राथमिक तंत्र के रूप में कार्य करते हैं। इन 44,170 निकायों की उपेक्षा करके, राज्य ने अनजाने में जल स्तर की गिरावट को तेज कर दिया है, जिससे एक ऐसा दुष्चक्र बन गया है जहाँ किसान गहरे बोरवेल खोद रहे हैं क्योंकि उन्हें भरने वाले टैंक सूखे या अतिक्रमित हैं।
लघु सिंचाई की व्यवस्थित उपेक्षा ने ग्रामीण पर्यावरण की रीढ़ को तोड़ दिया है, जिससे एक टिकाऊ जल पारिस्थितिकी तंत्र बोरवेल-निर्भर बंजर भूमि में बदल गया है।
पैनल की सिफारिशें व्यापक हैं, जिसमें अतिक्रमणों की कानूनी पहचान और उन्हें हटाने के लिए फुल टैंक लेवल (FTL) सीमाओं को तत्काल निर्धारित करने पर जोर दिया गया है। इसके अलावा, समिति ने छोटी तकनीकी इकाइयों के निर्माण और कमांड क्षेत्र आधारित प्रबंधन प्रणालियों के माध्यम से लघु और प्रमुख सिंचाई स्रोतों को एकीकृत करने का सुझाव दिया है।
वित्तीय स्थिरता भी इस प्रस्ताव का एक मुख्य स्तंभ है। विशेषज्ञों ने WALTA और PR अधिनियमों में संशोधन का सुझाव दिया है ताकि जल उपयोगकर्ता संघों (WUAs) और पंचायत राज निकायों को जल उपकर (Water Cess) वसूलने का अधिकार मिल सके। इससे रखरखाव के लिए स्थानीय स्तर पर धन उपलब्ध होगा और जवाबदेही बढ़ेगी।
प्रशासन के अलावा, रिपोर्ट में क्षमता निर्माण की आवश्यकता पर बल दिया गया है। इसमें किसानों के लिए कुशल जल उपयोग योजना पर प्रशिक्षण कार्यक्रम और पंप-सेटों के आधुनिकीकरण का आह्वान किया गया है, जिससे पैनल के अनुमान के अनुसार राज्य की ऊर्जा खपत में सालाना लगभग ₹3,000 करोड़ की बचत हो सकती है।
| विशेषता | विलय के बाद की स्थिति (वर्तमान) | प्रस्तावित पुनर्गठित प्रणाली |
|---|---|---|
| पर्यवेक्षण | केंद्रीकृत/उपेक्षित | विकेंद्रीकृत तकनीकी इकाइयाँ |
| रखरखाव | निष्क्रिय WUA | सशक्त PR निकाय और WUA |
| जल स्रोत | बोरवेल पर भारी निर्भरता | एकीकृत लघु और प्रमुख स्रोत |
| वित्त पोषण | राज्य पर निर्भर | स्थानीय जल उपकर संग्रह |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1: सिंचाई विभागों के विलय को विफलता क्यों माना गया?
विलय के कारण प्रशासन का ध्यान केवल बड़ी परियोजनाओं पर केंद्रित हो गया, जिससे 44,170 छोटे टैंक बिना किसी उचित इंजीनियरिंग पर्यवेक्षण या रखरखाव के रह गए।
प्रश्न 2: प्रस्तावित बदलावों से किसानों को कैसे लाभ होगा?
टैंकों की बहाली और अतिक्रमण हटाने से किसानों को सतह के पानी तक फिर से पहुंच मिलेगी, जिससे महंगे बोरवेलों पर उनकी निर्भरता कम होगी और बिजली का खर्च घटेगा।