आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने कनाडा में कहा कि भारत ने सैन्य या आर्थिक प्रभुत्व के बजाय अपने चरित्र और सेवा की परंपरा के माध्यम से 'विश्वगुरु' का दर्जा प्राप्त किया है। उन्होंने वैश्विक एकता के लिए 'वसुधैव कुटुंबकम' के विचार पर जोर दिया।
- भारत ने 'महाशक्ति' बनने के बजाय अपने चरित्र और सेवा भाव से 'विश्वगुरु' का स्थान पाया है।
- आरएसएस प्रमुख के अनुसार, भारत की परंपरा ज्ञान साझा करने की रही है, न कि विजय या धर्मांतरण की।
- भारत का 'डीएनए' संकट के समय दुनिया की मदद करने और प्रताड़ित समुदायों को शरण देने में है।
- व्यक्तिगत सुख, सामाजिक कल्याण और पर्यावरण के बीच संतुलन के लिए 'तीसरे मार्ग' का प्रस्ताव।
कनाडा में भारतीय समुदाय को संबोधित करते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने वैश्विक स्तर पर भारत की भूमिका को नए सिरे से परिभाषित किया। उन्होंने कहा कि भारत 'विश्वगुरु' बना है, न कि किसी 'महाशक्ति' (सुपरपावर) के रूप में। उन्होंने तर्क दिया कि भारत का उत्थान मानवता को अधिक एकजुट और मुक्त बनाने के उद्देश्य से होना चाहिए।
भागवत ने कहा कि इतिहास में जब भी भारत बड़ा बना, उसने कभी दुनिया पर प्रभुत्व जमाने की कोशिश नहीं की। उन्होंने मेक्सिको से साइबेरिया और दक्षिण-पूर्व एशिया तक भारतीयों की यात्राओं का उदाहरण देते हुए कहा कि उन्होंने किसी देश को नहीं जीता और न ही किसी का धर्म परिवर्तन कराया, बल्कि गणित, आयुर्वेद और सभ्यता के मूल्यों का प्रसार किया।
यह क्यों महत्वपूर्ण है
BozokMedia के विश्लेषण के अनुसार, यह बयान इस बात का संकेत है कि आरएसएस अब भारत की 'सॉफ्ट पावर' को वैश्विक स्तर पर कैसे प्रोजेक्ट करना चाहता है। 'सुपरपावर' शब्द अक्सर सैन्य वर्चस्व से जुड़ा होता है, जबकि 'विश्वगुरु' शब्द नैतिक और आध्यात्मिक नेतृत्व को दर्शाता है। यह रणनीति भारत को एक ऐसे वैश्विक नेता के रूप में पेश करती है जो टकराव के बजाय समन्वय में विश्वास रखता है।
आरएसएस प्रमुख ने स्पष्ट किया कि हिंदू सोच विविधता में एकता देखने की क्षमता रखती है। उन्होंने भारत द्वारा प्रताड़ित समुदायों को शरण देने का जिक्र करते हुए पारसी और यहूदी समुदायों का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि यह समावेशिता भारत के डीएनए में है और यह केवल एक धार्मिक पहचान नहीं, बल्कि एक सभ्यतागत पहचान है।
"भारत का उत्थान केवल जीडीपी या सैन्य शक्ति से नहीं, बल्कि इस बात से मापा जाना चाहिए कि वह दुनिया को यह सिखा सके कि विविधता के साथ एकता कैसे संभव है।"
वर्तमान वैश्विक चुनौतियों, जैसे जलवायु परिवर्तन और सामूहिक विनाश के हथियारों के खतरों पर बात करते हुए, भागवत ने विकास के मौजूदा मॉडल पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि ऐसा विकास व्यर्थ है जहाँ एक समूह की समृद्धि दूसरे के दुख पर आधारित हो। उन्होंने हिंदुस्तान के प्राचीन 'तीसरे मार्ग' का प्रस्ताव दिया, जहाँ धर्म का अर्थ केवल पूजा-पाठ नहीं, बल्कि संतुलन और सबको अपना मानने की भावना है।
कनाडा में उनका यह संबोधन न्यूयॉर्क के मैडिसन स्क्वायर गार्डन में दिए गए भाषण के बाद आया है। उन्होंने जोर देकर कहा कि भारत को उपदेशों के माध्यम से नहीं, बल्कि अपने आचरण और उदाहरण के माध्यम से दुनिया का नेतृत्व करना चाहिए। उन्होंने दुनिया भर के हिंदुओं से आग्रह किया कि वे वसुधैव कुटुंबकम के विचार को साझा करें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1: मोहन भागवत के अनुसार 'महाशक्ति' और 'विश्वगुरु' में क्या अंतर है?
एक महाशक्ति आमतौर पर सैन्य और आर्थिक प्रभुत्व के माध्यम से दुनिया को नियंत्रित करती है, जबकि एक विश्वगुरु अपने नैतिक चरित्र, ज्ञान और निस्वार्थ सेवा के माध्यम से दुनिया का मार्गदर्शन करता है।
प्रश्न 2: मोहन भागवत ने 'हिंदू' पहचान को कैसे परिभाषित किया?
उन्होंने इसे धार्मिक के बजाय सभ्यतागत शब्दों में परिभाषित किया और कहा कि हिंदू वह है जो सभी को स्वीकार करता है और सभी का सम्मान करता है, चाहे उनकी भाषा या पूजा पद्धति कुछ भी हो।