कोलकाता के जादवपुर विश्वविद्यालय में छात्रों ने प्रशासन द्वारा मिटाए गए राजनीतिक भित्तिचित्रों (graffiti) को फिर से चित्रित कर 'दीवारों पर अपना अधिकार' जताया है। यह घटना परिसर में वैचारिक टकराव को और गहरा करती है।
- JU छात्रों ने कार्ल मार्क्स, हो ची मिन्ह और उर्दू शायरी वाले भित्तिचित्रों को फिर से पेंट किया।
- राज्य सरकार द्वारा 'राष्ट्र-विरोधी' सामग्री की चेतावनी के बाद प्रशासन ने इन्हें मिटाया था।
- विश्वविद्यालय परिसर दक्षिणपंथी बनाम वामपंथी विचारधारा के टकराव का केंद्र बन गया है।
जादवपुर विश्वविद्यालय (JU) का परिसर एक बार फिर वैचारिक अभिव्यक्ति का युद्धक्षेत्र बन गया है। सोमवार सुबह, छात्रों ने उन भित्तिचित्रों को फिर से पेंट करना शुरू कर दिया जिन्हें विश्वविद्यालय प्रशासन ने पिछले सप्ताहांत में सफेद रंग से पुतवा दिया था। छात्रों ने इसे परिसर की दीवारों को 'पुनः प्राप्त' (reclaim) करने का प्रयास बताया है।
इन नए भित्तिचित्रों में कार्ल मार्क्स का एक उग्र उद्धरण शामिल है: "हमारे पास कोई करुणा नहीं है/और हम आपसे कोई करुणा नहीं मांगते/जब हमारी बारी आएगी, तो हम आतंक के लिए कोई बहाना नहीं बनाएंगे।" इसके अलावा, दीवारों पर उर्दू की नज़्में और हो ची मिन्ह के चित्र भी देखे गए। छात्र सांस्कृतिक समूह 'आर्ट अगेंस्ट ऑप्रेशन' ने इसे कलात्मक अभिव्यक्ति और राजनीतिक प्रतिरोध का संगम बताया है।
यह क्यों महत्वपूर्ण है?
BozokMedia के विश्लेषण के अनुसार, यह केवल पेंट और दीवारों का विवाद नहीं है, बल्कि शैक्षणिक स्थानों की स्वायत्तता की लड़ाई है। जादवपुर विश्वविद्यालय की दीवारें दशकों से असंतोष के 'जीवंत संग्रह' के रूप में रही हैं। प्रशासन द्वारा इन्हें मिटाना राज्य द्वारा कैंपस की आवाज़ को दबाने की कोशिश है, जबकि छात्रों का इसे फिर से रंगना यह दर्शाता है कि वैचारिक स्वतंत्रता को सफेद रंग से ढका नहीं जा सकता।
कैंपस की दीवारों से नारों का मिटाया जाना अक्सर छात्र संघों और शैक्षणिक स्वतंत्रता पर व्यापक प्रहार की शुरुआत होता है।
यह विवाद तब और बढ़ गया जब मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने इन भित्तिचित्रों को 'राष्ट्र-विरोधी' बताते हुए प्रशासन से सख्त कार्रवाई करने को कहा। कुलपति चिरंजीब भट्टाचार्य ने कहा कि कैंपस की दीवारें विश्वविद्यालय की संपत्ति हैं और वे राजनीतिक भित्तिचित्रों को प्रोत्साहित नहीं करते हैं। उन्होंने सोशल मीडिया के युग में इस परंपरा की उपयोगिता पर भी सवाल उठाए।
तनाव की जड़ें गहरी हैं। 19 अगस्त को अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) के समर्थकों ने परिसर में घुसकर वामपंथी छात्र संगठनों के पोस्टरों को फाड़ने और झंडों को जलाने का प्रयास किया था। तब से विश्वविद्यालय में माहौल तनावपूर्ण है और यह पश्चिम बंगाल में दक्षिण बनाम वाम राजनीति का मुख्य केंद्र बन गया है।
CPI(M) के राज्य सचिव ने प्रशासन की कार्रवाई की निंदा करते हुए कहा कि दीवार लेखन जनता की भावनाओं को दर्शाता है। उन्होंने तर्क दिया कि मुद्दा यह नहीं है कि कोई नारे से सहमत है या नहीं, बल्कि यह है कि क्या छात्रों को अपनी शिकायतों और असहमति को व्यक्त करने की स्वतंत्रता है।
दृष्टिकोणों की तुलना
| पक्ष | भित्तिचित्रों पर विचार | प्रस्तावित कार्रवाई |
|---|---|---|
| छात्र/वामपंथी | प्रतिरोध और अभिव्यक्ति का प्रतीक | पुनः चित्रित करना |
| विश्वविद्यालय प्रशासन | विश्वविद्यालय की संपत्ति; पुराना तरीका | मिटाना/हतोत्साहित करना |
| राज्य सरकार | 'राष्ट्र-विरोधी' और खतरनाक | सख्त हटाव और निगरानी |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1: विश्वविद्यालय ने दीवारों को सफेद क्यों किया?
राज्य सरकार द्वारा फिलिस्तीन और माओवादी नेता किशनजी के समर्थन वाले नारों को 'राष्ट्र-विरोधी' बताए जाने के बाद प्रशासन ने यह कदम उठाया।
प्रश्न 2: 'आर्ट अगेंस्ट ऑप्रेशन' क्या है?
यह JU छात्रों का एक सांस्कृतिक समूह है जो कैंपस की दीवारों को फिर से रंगने को प्रशासनिक सेंसरशिप के खिलाफ एक राजनीतिक प्रतिरोध मानता है।