केरल उच्च न्यायालय ने डीजीपी एस. श्रीजीत के खिलाफ भ्रष्टाचार और सत्ता के दुरुपयोग के आरोपों के बाद महत्वपूर्ण दस्तावेज पेश करने का निर्देश दिया है, जिससे सरकारी तंत्र में खलबली मच गई है।
- केरल हाई कोर्ट ने ACS (गृह) और VACB को डीजीपी एस. श्रीजीत के खिलाफ दस्तावेज सीलबंद लिफाफे में जमा करने का आदेश दिया।
- दिपिन एडवाना नामक अधिकारी ने भ्रष्टाचार, अनधिकृत विदेश यात्रा और खरीद अनियमितताओं के आरोप लगाए हैं।
- अदालत उस सरकारी आदेश की समीक्षा कर रही है जिसने इन शिकायतों को 'अनुमानित' बताकर खारिज कर दिया था।
प्रशासनिक जवाबदेही की दिशा में एक बड़े कदम के रूप में, केरल उच्च न्यायालय ने अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) और सतर्कता एवं भ्रष्टाचार विरोधी ब्यूरो (VACB) को पुलिस महानिदेशक (DGP) एस. श्रीजीत के खिलाफ लगे गंभीर आरोपों से संबंधित सभी दस्तावेज पेश करने का निर्देश दिया है। यह आदेश मलप्पुरम के सहायक मोटर वाहन निरीक्षक दिपिन एडवाना द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवाई के दौरान आया।
यह कानूनी लड़ाई एसीएस (ACS) के उस पिछले फैसले के खिलाफ है, जिसमें VACB को सूचित किया गया था कि वर्तमान में सतर्कता जांच की आवश्यकता नहीं है। सरकार ने पहले इन शिकायतों को "सामान्य और अनुमानित" करार दिया था, जिस पर अब हाई कोर्ट सवाल उठा रहा है। जस्टिस ए. बदरुद्दीन ने विशेष रूप से निर्देश दिया है कि प्रतिनिधित्व में उल्लिखित रिकॉर्ड को सीलबंद कवर में जमा किया जाए ताकि पारदर्शिता बनी रहे।
मुख्य आरोप क्या हैं?
डीजीपी एस. श्रीजीत के खिलाफ आरोप काफी व्यापक हैं, जो राज्य प्रशासन में उनके द्वारा निभाए गए विभिन्न पदों तक फैले हुए हैं। याचिका के अनुसार, डीजीपी ने बिना उचित अनुमति के एक निजी उद्यम के उद्घाटन के लिए अबू धाबी की यात्रा की। इसके अलावा, परिवहन आयुक्त के रूप में उनके कार्यकाल के दौरान ड्राइविंग लाइसेंस की छपाई और एआई (AI) कैमरों की खरीद में भारी अनियमितताओं और भ्रष्टाचार के आरोप लगाए गए हैं।
शिकायतों में कर्मियों के प्रबंधन और व्यक्तिगत आचरण पर भी सवाल उठाए गए हैं। श्री एडवाना ने पुलिस बल में हवलदारों की नियुक्ति में पक्षपात और अनियमितताओं का आरोप लगाया है। इसके साथ ही, संगीत समूहों और इंडियन राइफल एसोसिएशन से जुड़ी गतिविधियों पर भी सवाल उठाए गए हैं, जिसमें आरोप है कि उन्होंने पेशेवर सीमाओं का उल्लंघन किया।
यह मामला क्यों महत्वपूर्ण है?
BozokMedia का विश्लेषण बताता है कि यह मामला आंतरिक सरकारी मंजूरी और न्यायिक निरीक्षण के बीच के तनाव को उजागर करता है। हालांकि एसीएस की रिपोर्ट ने डीजीपी का बचाव किया—यह कहते हुए कि अबू धाबी यात्रा आकस्मिक अवकाश पर की गई थी और कलात्मक गतिविधियां 'अखिल भारतीय सेवा (आचरण) नियमों' के तहत मान्य हैं—लेकिन अदालत का हस्तक्षेप यह संकेत देता है कि जब सार्वजनिक खरीद (जैसे एआई कैमरे) में अनियमितताओं का आरोप हो, तो केवल "आंतरिक मंजूरी" पर्याप्त नहीं होती।
उच्च अधिकारियों से जुड़े भ्रष्टाचार के मामलों में जब सरकार उन्हें खारिज करती है, तो न्यायपालिका का सीलबंद दस्तावेजों की मांग करना यह दर्शाता है कि वह किसी भी स्तर पर लापरवाही बर्दाश्त नहीं करेगी।
सरकार का तर्क है कि इस बात का कोई सबूत नहीं है कि डीजीपी ने अबू धाबी कार्यक्रम के दौरान पुलिस वर्दी पहनी थी और राज्य पुलिस प्रमुख ने हवलदार नियुक्तियों को सही ठहराया है। हालांकि, अदालत ने अब अधिकारियों को अपने औपचारिक बयान या आपत्तियां दाखिल करने का निर्देश दिया है ताकि याचिकाकर्ता के दावों का व्यापक कानूनी विश्लेषण किया जा सके।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1: डीजीपी एस. श्रीजीत के खिलाफ याचिका किसने दायर की?
यह याचिका मलप्पुरम के सहायक मोटर वाहन निरीक्षक दिपिन एडवाना द्वारा दायर की गई थी।
प्रश्न 2: किन विशिष्ट खरीद अनियमितताओं का उल्लेख किया गया है?
आरोपों में परिवहन आयुक्त के रूप में कार्यकाल के दौरान ड्राइविंग लाइसेंस की छपाई और एआई कैमरों की खरीद में अनियमितताएं शामिल हैं।