कोलकाता के जादवपुर विश्वविद्यालय में प्रशासन द्वारा दीवारों की सफेदी किए जाने के कुछ ही घंटों बाद लेफ्ट छात्र संगठनों ने फिर से राजनीतिक नारे लिख दिए हैं। यह विवाद ABVP और SFI के बीच हालिया झड़पों और विवादास्पद नारों के बाद गहरा गया है।
- प्रशासन द्वारा सफेदी किए जाने के तुरंत बाद SFI और अन्य लेफ्ट संगठनों ने दीवारों पर फिर से नारे लिखे।
- SFI ने 'रिक्लेम द वॉल' अभियान शुरू किया है और 28 फरवरी 2027 की समयसीमा तय की है।
- विवाद की जड़ में ABVP और लेफ्ट संगठनों के बीच झड़पें और 'फासीवाद' व 'फ्री फिलिस्तीन' जैसे नारे हैं।
कोलकाता के प्रतिष्ठित जादवपुर विश्वविद्यालय (JU) का परिसर एक बार फिर राजनीतिक युद्ध का मैदान बन गया है। विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा दीवारों से विवादास्पद नारों को मिटाकर सफेदी किए जाने के कुछ ही घंटों के भीतर, Students’ Federation of India (SFI) और अन्य वामपंथी छात्र संगठनों ने उन दीवारों पर फिर से राजनीतिक स्लोगन उकेर दिए हैं। छात्र संगठनों ने इसे अपनी अभिव्यक्ति की आजादी को 'पुनः प्राप्त' (Reclaim) करने के प्रयास के रूप में देखा है।
रविवार शाम को SFI कार्यकर्ताओं ने न केवल अपनी संगठन का नाम लिखा, बल्कि एक विशिष्ट तिथि “28.02.2027” भी अंकित की। संगठन का दावा है कि यह वह समयसीमा है जिसके भीतर वे विश्वविद्यालय की सभी दीवारों पर अपना प्रभाव वापस स्थापित करेंगे। इसके अलावा, उन्होंने मेघनाद सहा भवन की दीवारों पर 'फ्री फिलिस्तीन' के नारे लिखने और फिलिस्तीनी झंडा बनाने की योजना भी साझा की है।
Why This Matters
BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि यह केवल दीवारों पर पेंट करने का मामला नहीं है, बल्कि यह कैंपस के भीतर वैचारिक वर्चस्व की लड़ाई है। जादवपुर विश्वविद्यालय ऐतिहासिक रूप से वामपंथी राजनीति का गढ़ रहा है, लेकिन हाल के वर्षों में ABVP जैसी दक्षिणपंथी संस्थाओं के बढ़ते प्रभाव ने तनाव पैदा कर दिया है। यह संघर्ष शैक्षणिक वातावरण पर राजनीतिक ध्रुवीकरण के गहरे प्रभाव को दर्शाता है।
विश्वविद्यालय के कुलपति चिरंजीब भट्टाचार्य ने इस पूरी प्रक्रिया पर निराशा व्यक्त की है। उन्होंने सवाल उठाया कि सोशल मीडिया के दौर में दीवार लेखन का क्या महत्व रह गया है। कुलपति ने स्पष्ट किया कि प्रशासन ने केवल उन्हीं नारों को मिटाया है जो दूसरों की भावनाओं को ठेस पहुँचा सकते थे, न कि सभी राजनीतिक संदेशों को।
"कैंपस की दीवारों पर चलने वाला यह 'लिखने और मिटाने' का चक्र शैक्षणिक गरिमा के बजाय राजनीतिक अहंकार की लड़ाई अधिक प्रतीत होता है।"
यह विवाद तब और गरमा गया जब राज्य के प्रमुख नेताओं ने हस्तक्षेप किया। सुवेंदु अधिकारी ने विश्वविद्यालय की दीवारों पर 'किशनजी' (माओवादी नेता) को रेड सैल्यूट और 'कश्मीर चाहता है आजादी' जैसे नारों की कड़ी आलोचना की। उन्होंने इन नारों को 'कचरा' करार देते हुए कहा कि एक उत्कृष्टता केंद्र (Centre of Excellence) में ऐसी संस्कृति के लिए कोई स्थान नहीं होना चाहिए।
शनिवार को प्रशासन ने औरोबिंदो भवन, मैकेनिकल इंजीनियरिंग विभाग, सेंट्रल लाइब्रेरी और नज़rul भवन सहित कई प्रमुख इमारतों की दीवारों को साफ करने के लिए मजदूरों को लगाया था। हालांकि, लेफ्ट संगठनों की त्वरित प्रतिक्रिया ने यह साबित कर दिया है कि कैंपस में राजनीतिक सक्रियता अभी भी चरम पर है।
Frequently Asked Questions
प्रश्न 1: SFI ने 'रिक्लेम द वॉल' अभियान क्यों शुरू किया?
उत्तर: प्रशासन द्वारा उनकी राजनीतिक विचारधारा और नारों को सफेदी से मिटाने के विरोध में SFI ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए यह अभियान शुरू किया है।
उत्तर: प्रशासन और राजनीतिक विरोधियों ने माओवादी नेताओं के समर्थन, कश्मीर की आजादी और फासीवाद विरोधी हिंसक नारों पर आपत्ति जताई थी।