भारत ने हेग स्थित कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन के उस फैसले को पूरी तरह खारिज कर दिया है जिसमें सिंधु जल संधि को प्रभावी बताया गया था। विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि भारत अपनी संप्रभुता के निर्णयों पर किसी भी बाहरी हस्तक्षेप को स्वीकार नहीं करेगा।

  • भारत ने सिंधु जल संधि (IWT) को 'स्थगित' (Abeyance) रखने के अपने फैसले पर कायम रहने की पुष्टि की है।
  • हेग स्थित कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन (CoA) के आदेश को भारत ने 'अवैध' और 'शून्य' करार दिया है।
  • भारत का रुख स्पष्ट है: जब तक पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद को पूरी तरह बंद नहीं करता, संधि स्थगित रहेगी।

भारत सरकार ने सोमवार को एक कड़ा रुख अपनाते हुए हेग स्थित कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन (CoA) के उस फैसले को खारिज कर दिया है, जिसमें कहा गया था कि भारत सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty) को स्थगित नहीं कर सकता। विदेश मंत्रालय (MEA) ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि इस तथाकथित न्यायालय के पास भारत के संप्रभु निर्णयों पर टिप्पणी करने का कोई कानूनी अधिकार या अधिकार क्षेत्र (Jurisdiction) नहीं है।

विवाद की जड़ में वह फैसला है जिसमें अंतरराष्ट्रीय कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि संधि को निलंबित या समाप्त करने के लिए भारत द्वारा दिए गए तर्क अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत मान्य नहीं हैं। कोर्ट ने निर्देश दिया था कि भारत को पश्चिमी नदियों पर अपनी जलविद्युत परियोजनाओं के डिजाइन और संचालन के संबंध में संधि के दायित्वों का पालन करना चाहिए। हालांकि, भारत ने इस पूरी प्रक्रिया को ही अवैध बताया है।

क्यों महत्वपूर्ण है यह मामला?

BozokMedia विश्लेषण के अनुसार, यह केवल पानी के बंटवारे का विवाद नहीं है, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और कूटनीतिक दबाव की लड़ाई है। भारत ने 23 अप्रैल 2025 को कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी (CCS) के निर्णय के बाद इस संधि को स्थगित किया था, जो सीधे तौर पर अप्रैल में हुए पहलगाम आतंकवादी हमले की प्रतिक्रिया थी। भारत का तर्क है कि आतंकवाद और जल सहयोग एक साथ नहीं चल सकते।

"भारत का यह कदम वैश्विक मंच पर यह संदेश है कि राष्ट्रीय सुरक्षा अब किसी भी अंतरराष्ट्रीय समझौते से ऊपर है, विशेषकर जब पड़ोसी देश आतंकवाद का समर्थन करता हो।"

भारत ने लगातार यह तर्क दिया है कि विश्व बैंक द्वारा गठित यह कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन संधि की शर्तों का उल्लंघन है। भारत ने इस निकाय के सामने उपस्थित होने से इनकार कर दिया है और इसके पिछले सभी फैसलों को भी शून्य माना है।

ऐतिहासिक रूप से, 1960 में हस्ताक्षरित सिंधु जल संधि को दुनिया की सबसे सफल संधियों में से एक माना जाता था, क्योंकि युद्धों के बावजूद यह टिकी रही। लेकिन हालिया आतंकवाद विरोधी रुख ने इस समीकरण को पूरी तरह बदल दिया है।

क्या आप जानते हैं?: सिंधु जल संधि 1960 में भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान के बीच विश्व बैंक की मध्यस्थता से हुई थी।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रश्न 1: भारत ने सिंधु जल संधि को स्थगित क्यों किया?
उत्तर: पहलगाम आतंकवादी हमले के बाद, भारत ने निर्णय लिया कि जब तक पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद को पूरी तरह और स्थायी रूप से बंद नहीं करता, तब तक संधि स्थगित रहेगी।

p>प्रश्न 2: कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन (CoA) क्या है?
उत्तर: यह विश्व बैंक द्वारा गठित एक मध्यस्थता निकाय है, जिसे भारत अवैध मानता है और जिसके अधिकार क्षेत्र को स्वीकार नहीं करता।