दिल्ली स्टेट कैंसर इंस्टीट्यूट में महंगी मशीनें धूल फांक रही हैं, जबकि गरीब मरीज निजी केंद्रों पर महंगे टेस्ट कराने को मजबूर हैं। सरकारी सुविधाओं के अभाव में मध्यमवर्गीय और गरीब परिवारों पर इलाज का भारी आर्थिक बोझ पड़ रहा है।

  • दिल्ली स्टेट कैंसर इंस्टीट्यूट (DSCI) में अत्याधुनिक मशीनें होने के बावजूद स्टाफ की कमी और अन्य कारणों से वे अनुपयोगी पड़ी हैं।
  • मरीजों को दवाओं और PET-CT स्कैन जैसे महत्वपूर्ण टेस्ट के लिए निजी केंद्रों पर भेजा जा रहा है, जिससे भारी खर्च हो रहा है।
  • एक ऑडिट के अनुसार, दिल्ली के सरकारी अस्पतालों में करोड़ों की मशीनें बिना इस्तेमाल के पड़ी हैं।

दिल्ली की राजधानी में स्थित दिल्ली स्टेट कैंसर इंस्टीट्यूट (DSCI), जिसे कैंसर रोगियों के लिए एक उम्मीद की किरण माना जाता था, अब मरीजों के लिए आर्थिक संकट का कारण बनता जा रहा है। अस्पताल का दावा है कि उसके पास 'अल्ट्रा-मॉडर्न' सुविधाएं हैं, लेकिन जमीनी हकीकत इसके बिल्कुल उलट है। यहाँ की महंगी मशीनें धूल फांक रही हैं, जबकि गरीब मरीज निजी डायग्नोस्टिक सेंटरों के चक्कर काटने को मजबूर हैं।

जाफ्रराबाद की रहने वाली 48 वर्षीय सबरा की कहानी इस बदहाली का जीता-जागता उदाहरण है। एक दर्जी के रूप में काम करने वाली सबरा के पति ई-रिक्शा चलाते हैं और महीने के मात्र 20,000 रुपये कमाते हैं। सबरा को उम्मीद थी कि सरकारी अस्पताल में इलाज मुफ्त होगा, लेकिन पिछले दो वर्षों में उन्हें दवाओं पर ही 1.2 लाख रुपये से अधिक खर्च करने पड़े। उन्हें कैंसर की दवा 'ट्रैस्टुजुमैब' (trastuzumab) के लिए हर महीने 4,000 से 5,000 रुपये निजी तौर पर खर्च करने पड़ रहे हैं।

Why This Matters

BozokMedia analysis shows कि यह केवल एक अस्पताल की समस्या नहीं है, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली की एक गहरी विफलता है। जब सरकारी संस्थान बुनियादी परीक्षण करने में असमर्थ होते हैं, तो वे अनजाने में एक ऐसा 'इकोसिस्टम' बना देते हैं जहाँ निजी क्लीनिक सरकारी रेफरल का फायदा उठाकर मरीजों की जेब पर भारी पड़ता है। इससे स्वास्थ्य असमानता और गहरी होती जा रही है।

सरकारी संसाधनों का इस तरह बेकार पड़ा रहना स्वास्थ्य सेवाओं के प्रति प्रशासनिक उदासीनता का सबसे बड़ा प्रमाण है।

अस्पताल के भीतर की स्थिति भी चिंताजनक है। एक तरफ जहाँ आधुनिक चिकित्सा उपकरणों की कमी है, वहीं दूसरी ओर अस्पताल के कुछ हिस्से अधूरे निर्माण के कारण खंडहर की तरह पड़े हैं। मरीजों को बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। उदाहरण के लिए, मुर्शिदाबाद की 62 वर्षीय सरिता, जो लिंफोमा से जूझ रही हैं, उन्हें PET-CT स्कैन के लिए अस्पताल के बजाय निजी केंद्र पर जाने को कहा गया। एक दिहाड़ी मजदूर के लिए 12,000 रुपये का स्कैन कराना लगभग असंभव है, जो उसकी मासिक आय का तीन-चौथाई हिस्सा है।

हैरानी की बात यह है कि DSCI के पास ये मशीनें मौजूद हैं। रिकॉर्ड बताते हैं कि 2017 में न्यूक्लियर मेडिसिन विभाग में लगभग 6.3 मिलियन डॉलर की लागत से उच्च तकनीक वाली मशीनें लगाई गई थीं। यहाँ तक कि एक मेडिकल साइक्लोट्रॉन, जो PET स्कैन के लिए आइसोटोप बनाता है, 2018 से बिना उपयोग के पड़ा है।

Did You Know?: दिल्ली हाई कोर्ट द्वारा किए गए एक ऑडिट में पाया गया कि राजधानी के 26 सरकारी अस्पतालों में करोड़ों की चिकित्सा मशीनें बिना उपयोग के पड़ी हैं।

Frequently Asked Questions

प्रश्न 1: दिल्ली स्टेट कैंसर इंस्टीट्यूट में समस्या क्या है?
उत्तर: मुख्य समस्या स्टाफ की कमी और मशीनों का अनुपयोगी होना है, जिसके कारण मरीजों को निजी केंद्रों पर महंगे टेस्ट के लिए भेजा जाता है।

प्रश्न 2: क्या सरकारी अस्पताल में टेस्ट मुफ्त नहीं हैं?
उत्तर: सिद्धांत रूप में वे मुफ्त होने चाहिए, लेकिन वर्तमान में कई महत्वपूर्ण टेस्ट (जैसे PET-CT) के लिए मरीजों को बाहर रेफर किया जा रहा है।