प्रशांत महासागर में एक रिकॉर्ड-तोड़ 'सुपर अल नीनो' विकसित हो रहा है, जिससे वैश्विक तापमान में भारी वृद्धि हुई है। इसका असर दुनिया भर में भीषण बाढ़, सूखे और समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र के विनाश के रूप में दिख रहा है।
- नीनो 3.4 क्षेत्र 'सुपर अल नीनो' की सीमा को पार कर गया है, और तापमान सामान्य से दोगुना अधिक होने की संभावना है।
- किरितिमती के 90% कोरल रीफ नष्ट हो चुके हैं और पेरू में समुद्री पक्षियों की सामूहिक मृत्यु हो रही है।
- भारत और इथियोपिया में रिकॉर्ड सूखे की स्थिति है, जबकि चिली और पेरू में विनाशकारी बाढ़ आई है।
प्रशांत महासागर के केंद्र में, भूमध्य रेखा के साथ स्थित नीनो 3.4 नामक क्षेत्र में वैज्ञानिकों ने तापमान में ऐसी वृद्धि देखी है जिसने पूरी दुनिया को चिंता में डाल दिया है। आमतौर पर, यदि पानी का तापमान सामान्य से 0.5 डिग्री सेल्सियस बढ़ जाता है, तो उसे अल नीनो की शुरुआत माना जाता है। लेकिन वर्तमान स्थिति पिछले आठ दशकों में सबसे गंभीर है। शोधकर्ता क्रिस्टीना टिटजेन के अनुसार, समुद्र का पानी अब किसी 'बेबी पूल' की तरह गर्म हो चुका है, जो समुद्री जीवन के लिए घातक है।
इस गर्मी का सबसे बुरा असर उष्णकटिबंधीय कोरल रीफ्स (मूंगा चट्टानों) पर पड़ा है। दुनिया के सबसे बड़े एटोल, किरितिमती में, 2015-16 के अल नीनो के दौरान 90% कोरल नष्ट हो गए थे। अब, जब समुद्र का औसत तापमान पहले से ही बढ़ रहा है, तो बचे हुए कोरल का लगभग आधा हिस्सा 'ब्लीच' (सफेद) हो चुका है। यदि तापमान इसी तरह बढ़ता रहा, तो ये जीवंत समुद्री बगीचे जल्द ही कब्रिस्तान में बदल जाएंगे।
यह क्यों महत्वपूर्ण है?
BozokMedia के विश्लेषण से पता चलता है कि यह केवल एक प्राकृतिक चक्र नहीं है, बल्कि जलवायु परिवर्तन का एक खतरनाक परिणाम है। चूंकि ये चक्र अब पहले से ही गर्म हो चुके महासागरों में घटित हो रहे हैं, इसलिए तापमान की चोटें और अधिक गहरी होती जा रही हैं। कोपरनिकस क्लाइमेट चेंज सर्विस के अनुसार, वैश्विक औसत समुद्र-सतह का तापमान 21.1 डिग्री सेल्सियस तक पहुँच गया है, जो अब तक का उच्चतम स्तर है। इसका मतलब है कि अब एक सामान्य अल नीनो भी 'सुपर अल नीनो' जैसी तबाही मचा सकता है।
"हम अब पूरी तरह आश्वस्त हैं कि यह एक असाधारण घटना होगी," हवाई विश्वविद्यालय के अंतर्राष्ट्रीय प्रशांत अनुसंधान केंद्र के निदेशक माल्टे स्टुकर ने कहा।
इस घटना का प्रभाव केवल समुद्र तक सीमित नहीं है। दक्षिण अमेरिका के तट पर हम्बोल्ट करंट, जो पोषक तत्वों से भरपूर ठंडा पानी लाता है, अब गर्म पानी द्वारा विस्थापित किया जा रहा है। इसके परिणामस्वरूप मछलियों (विशेषकर एंकोवी) की संख्या में भारी गिरावट आई है, जिससे पेरू को अपनी मत्स्य पालन अर्थव्यवस्था को बंद करना पड़ा है। पेरू के तटों पर सैकड़ों मृत पक्षी देखे गए हैं और कई द्वीपों पर घोंसले खाली पड़े हैं क्योंकि माता-पिता भोजन की कमी के कारण अपने बच्चों को छोड़ चुके हैं।
वायुमंडलीय स्तर पर, यह दुनिया को दो विपरीत छोरों पर धकेल रहा है। जहाँ अमेरिका के दक्षिणी हिस्सों में भारी बारिश हो रही है, वहीं भारत और इथियोपिया जैसे देश अपने इतिहास के सबसे सूखे गर्मियों का सामना कर रहे हैं। पेरू में मूसलाधार बारिश और भूस्खलन के कारण प्रसिद्ध माचू पिचू मार्ग को बंद करना पड़ा है, जबकि चिली के शुष्क क्षेत्रों में बाढ़ ने तबाही मचाई है।
भविष्य की चेतावनी और भी डरावनी है। समुद्र की सतह से 100 मीटर नीचे गर्म पानी का एक विशाल भंडार जमा हो गया है, जो आने वाले महीनों में सतह पर आएगा। यह गर्मी वैश्विक तापमान के ग्राफ को एक ऐसे अनजान क्षेत्र में ले जा रही है जहाँ से वापसी संभव नहीं हो सकती।
| क्षेत्र | सामान्य अल नीनो प्रभाव | वर्तमान 'सुपर' घटना प्रभाव |
|---|---|---|
| पेरू/चिली | मध्यम बारिश/मछली की कमी | घातक बाढ़/मत्स्य पालन बंद |
| भारत/इथियोपिया | कम वर्षा | रिकॉर्ड तोड़ भीषण सूखा |
| कोरल रीफ्स | समय-समय पर ब्लीचिंग | व्यापक और अपरिवर्तनीय विनाश |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न: नीनो 3.4 क्षेत्र क्या है?
उत्तर: यह प्रशांत महासागर का एक विशिष्ट आयताकार क्षेत्र है जिसका उपयोग वैज्ञानिक अल नीनो की निगरानी और तापमान विसंगतियों को मापने के लिए करते हैं।
प्रश्न: जलवायु परिवर्तन अल नीनो को कैसे प्रभावित करता है?
उत्तर: जलवायु परिवर्तन ने समुद्र के आधार तापमान को बढ़ा दिया है, जिससे अल नीनो के दौरान तापमान अब पहले की तुलना में कहीं अधिक खतरनाक स्तर तक पहुँच जाता है।