जम्मू-कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय ने बिना जांच के बर्खास्त किए गए एक बैंक अधिकारी को बहाल करने का निर्देश दिया है, यह स्पष्ट करते हुए कि CEO के पास बिना उचित प्रक्रिया के बर्खास्तगी का अधिकार नहीं है।
- हाई कोर्ट ने बिना जांच के बर्खास्त किए गए डिप्टी जनरल मैनेजर सादुत हुसैन पंपोरी की बहाली का आदेश दिया।
- अदालत ने स्पष्ट किया कि बैंक CEO को राष्ट्रपति या राज्यपाल जैसे संवैधानिक अधिकार प्राप्त नहीं हैं।
- अदालत ने पाया कि केवल सोशल मीडिया पोस्ट और गोपनीय रिपोर्ट बर्खास्तगी का आधार नहीं हो सकते।
जम्मू-कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाते हुए जम्मू और कश्मीर बैंक के एक अधिकारी को सेवा में बहाल करने का निर्देश दिया है। अधिकारी, सादुत हुसैन पंपोरी, जिन्हें कथित तौर पर देश विरोधी गतिविधियों में शामिल होने के आरोप में बर्खास्त कर दिया गया था, को अदालत से बड़ी राहत मिली है। यह मामला तब सामने आया जब बैंक ने बिना किसी औपचारिक विभागीय जांच के पंपोरी को सेवा से हटा दिया था।
बैंक ने 15 जुलाई, 2024 को पंपोरी को 'ऑफिसर्स सर्विस मैनुअल' के क्लॉज 12.29 के तहत बर्खास्त किया था। यह क्लॉज CEO या MD को आतंकवाद या देश विरोधी गतिविधियों के मामलों में नियमित जांच के बिना बर्खास्तगी का अधिकार देता है। पंपोरी पर आरोप था कि उन्होंने सोशल मीडिया पर #TortureKashmir अभियान चलाया, जिसका उद्देश्य देश की संप्रभुता और अखंडता के खिलाफ झूठे नैरेटिव बनाना था।
Why This Matters
BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि यह फैसला प्रशासनिक मनमानी के खिलाफ एक बड़ी जीत है। अनुच्छेद 370 के हटने के बाद से जम्मू-कश्मीर में कई सरकारी कर्मचारियों को इसी तरह की प्रक्रियाओं के तहत बर्खास्त किया गया है। यह निर्णय स्थापित करता है कि कॉर्पोरेट या बैंकिंग संस्थाओं के प्रमुखों के पास वह 'असाधारण शक्ति' नहीं हो सकती जो केवल संवैधानिक प्रमुखों (जैसे राष्ट्रपति) के पास होती है।
बिना उचित जांच के किसी कर्मचारी को बर्खास्त करना एक अत्यंत कठोर कदम है, जिसे केवल दुर्लभतम मामलों में ही अपनाया जाना चाहिए।
न्यायमूर्ति संजय धर ने अपने आदेश में कहा कि जबकि राष्ट्रपति और राज्यपाल उच्च संवैधानिक पदों पर होते हैं और उन पर भरोसा किया जा सकता है, वही स्तर का भरोसा किसी बैंक के MD या CEO पर नहीं जताया जा सकता। अदालत ने पाया कि पंपोरी के खिलाफ कोई FIR दर्ज नहीं की गई थी और न ही किसी केंद्रीय एजेंसी ने उनकी संलिप्तता की पुष्टि की थी।
बैंक और सरकार ने तर्क दिया कि पुलिस ने एक गोपनीय जांच की थी और रिपोर्ट में सामग्री मिली थी। हालांकि, कोर्ट ने पाया कि यह रिपोर्ट केवल स्रोतों और सोशल मीडिया पोस्ट पर आधारित थी, जिसमें गवाहों की जांच या ठोस सबूतों का अभाव था।
Frequently Asked Questions
1. क्या बैंक CEO बिना जांच के किसी को निकाल सकता है?
इस मामले में, हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि बैंक CEO के पास बिना जांच के बर्खास्तगी का वह अधिकार नहीं है जो संवैधानिक प्रमुखों के पास होता है।
2. अधिकारी पर क्या आरोप थे?
उन पर सोशल मीडिया के माध्यम से देश विरोधी नैरेटिव फैलाने और #TortureKashmir अभियान चलाने का आरोप था।