कर्नाटक के लक्कुंडी में छिपे हुए ऐतिहासिक स्मारकों और संरचनाओं का पता लगाने के लिए पुरातत्व विभाग और NIAS ने एक ऐतिहासिक समझौता किया है। LiDAR और GPR जैसी उन्नत तकनीकों का उपयोग करके सदियों से वनस्पतियों के नीचे दबे रहस्यों को उजागर किया जाएगा।
- DAMH और NIAS के बीच लक्कुंडी में पुरातात्विक सर्वेक्षण के लिए समझौता हुआ।
- LiDAR, GIS मैपिंग और GPR जैसी आधुनिक तकनीकों का उपयोग किया जाएगा।
- लक्ष्य 10वीं-12वीं शताब्दी के बीच के छिपे हुए मंदिरों और कुओं को खोजना है।
- यह परियोजना लक्कुंडी को यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम है।
कर्नाटक के गडग जिले में स्थित ऐतिहासिक स्थल लक्कुंडी के रहस्यों को सुलझाने के लिए पुरातत्व विभाग (DAMH) ने एक क्रांतिकारी कदम उठाया है। विभाग ने नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस्ड स्टडीज (NIAS), बेंगलुरु के साथ एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए हैं, जिसका उद्देश्य उन प्राचीन स्मारकों का पता लगाना है जो समय के साथ वनस्पतियों और मिट्टी के नीचे दब गए हैं।
स्थानीय परंपराओं के अनुसार, लक्कुंडी में 101 मंदिर और 101 कुएं होने का दावा किया जाता है, लेकिन वर्तमान में इनमें से अधिकांश सतह पर दिखाई नहीं देते हैं। पुरातत्वविदों का मानना है कि जो स्मारक आज हमें दिख रहे हैं, वे इस समृद्ध शहरी केंद्र की कहानी का केवल एक छोटा सा हिस्सा हैं। 10वीं से 12वीं शताब्दी के बीच का यह क्षेत्र कल्याण-चालुक्य काल का एक प्रमुख केंद्र था।
तकनीकी क्रांति: कैसे खोजे जाएंगे अवशेष?
इस खोज में पारंपरिक खुदाई के बजाय अत्याधुनिक डिजिटल तकनीकों का सहारा लिया जाएगा। A. देवरजू, आयुक्त (DAMH) के अनुसार, इस परियोजना में LiDAR (Light Detection and Ranging), GIS मैपिंग, रिमोट सेंसिंग, और ग्राउंड पेनिट्रेटिंग रडार (GPR) का उपयोग किया जाएगा। ये तकनीकें घनी वनस्पतियों के पार देख सकती हैं और जमीन के नीचे छिपी संरचनाओं का सटीक मानचित्र तैयार कर सकती हैं।
यह तकनीक पुरातत्वविदों को बिना खुदाई किए जमीन के नीचे की संरचनाओं का सटीक खाका प्रदान करेगी, जिससे समय और संसाधन दोनों की बचत होगी।
इस पहल की शुरुआत तब हुई जब पूर्व मंत्री एच.के. पाटिल ने तत्कालीन इसरो (ISRO) अध्यक्ष किरण कुमार से चर्चा की थी। इसरो के सुझाव पर ही NIAS को इस वैज्ञानिक मिशन में शामिल किया गया है। NIAS के विशेषज्ञ पुराने फोटोग्राफों का अध्ययन करेंगे और ड्रोन के माध्यम से क्षेत्र का डिजिटल दस्तावेजीकरण करेंगे।
Why This Matters
BozokMedia विश्लेषण दिखाता है कि यह परियोजना केवल खोज तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत की सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के लिए एक नया रोडमैप तैयार कर रही है। लक्कुंडी के महत्व को देखते हुए, राज्य सरकार इसे यूनेस्को विश्व धरोहर स्थलों की संभावित सूची में शामिल करने के लिए एक विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) तैयार कर रही है।
लक्कुंडी की वास्तुकला अपनी विशिष्ट वेसर शैली के लिए जानी जाती है, जो नागर, द्रविड़ और भूमिज शैलियों का एक अनूठा मिश्रण है। यदि यह सर्वेक्षण सफल रहता है, तो यह भारतीय स्थापत्य कला के इतिहास को फिर से लिखने में मदद कर सकता है।
Frequently Asked Questions
1. LiDAR तकनीक पुरातत्व में कैसे मदद करती है?
LiDAR लेजर पल्स का उपयोग करके जमीन की सतह का त्रि-आयामी (3D) मानचित्र बनाता है, जिससे घने जंगलों के नीचे दबे अवशेषों को बिना हटाए देखा जा सकता है।
2. इस परियोजना का मुख्य लक्ष्य क्या है?
इसका मुख्य लक्ष्य लक्कुंडी के उन छिपे हुए मंदिरों और संरचनाओं का सटीक स्थान पता लगाना है जो सदियों से मिट्टी और वनस्पतियों के नीचे दबे हैं।