नीति आयोग की एक महत्वपूर्ण रिपोर्ट ने भारत के ज्ञान-आधारित अर्थव्यवस्था बनने के लक्ष्य में आने वाली बाधाओं को उजागर किया है, जिसमें कम जीडीपी खर्च और निजी निवेश की कमी मुख्य हैं।
- भारत का आरएंडडी (R&D) खर्च जीडीपी के 1% से कम है, जबकि दक्षिण कोरिया (4.8%) और अमेरिका (3.5%) बहुत आगे हैं।
- अनुसंधान राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन (ANRF) की लगभग 80% फंडिंग केवल IITs तक सीमित है।
- निजी क्षेत्र का योगदान 36% से कम है, जिससे लैब रिसर्च और मार्केट प्रोडक्ट के बीच एक बड़ी खाई पैदा हो गई है।
2047 तक एक विकसित राष्ट्र बनने के लक्ष्य के लिए भारत का ज्ञान-संचालित अर्थव्यवस्था (Knowledge-driven economy) बनना अनिवार्य है। हालांकि, नीति आयोग की हालिया रिपोर्ट 'ईज ऑफ डूइंग आरएंडडी इन इंडिया' ने देश के अनुसंधान और विकास (R&D) परिदृश्य में गंभीर संरचनात्मक कमियों की चेतावनी दी है। रिपोर्ट के अनुसार, वैज्ञानिक खोजों को व्यावसायिक उत्पादों में बदलने की क्षमता में भारी कमी है।
सबसे चौंकाने वाला तथ्य संसाधनों का केंद्रीकरण है। अनुसंधान राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन (ANRF), जिसे राष्ट्रीय अनुसंधान के लिए उत्प्रेरक माना गया था, की लगभग 80% फंडिंग केवल भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों (IITs) में केंद्रित है। हालांकि IITs उत्कृष्टता के केंद्र हैं, लेकिन यह वितरण दर्शाता है कि अनुसंधान फंडिंग का लोकतंत्रीकरण नहीं हुआ है, जिससे अन्य विश्वविद्यालय और छोटे संस्थान पूंजी की कमी से जूझ रहे हैं।
खर्च का अंतर: एक वैश्विक तुलना
वैश्विक नवाचार दिग्गजों की तुलना में, आरएंडडी के प्रति भारत की वित्तीय प्रतिबद्धता काफी कम है। सकल अनुसंधान व्यय (GERD) लगातार जीडीपी के 1% से नीचे रहा है। इसके विपरीत, वे देश जो तकनीकी दौड़ में आगे हैं, अपने राष्ट्रीय उत्पादन का एक बड़ा हिस्सा नवाचार में लगाते हैं।
| देश | R&D खर्च (% जीडीपी) | प्राथमिक वित्त पोषण स्रोत |
|---|---|---|
| दक्षिण कोरिया | ~4.8% | निजी क्षेत्र |
| संयुक्त राज्य अमेरिका | ~3.5% | निजी क्षेत्र |
| चीन | >2.4% | मिश्रित/राज्य-नेतृत्व |
| भारत | <1.0% | सार्वजनिक क्षेत्र |
यह क्यों महत्वपूर्ण है?
BozokMedia के विश्लेषण से पता चलता है कि समस्या केवल धन की मात्रा की नहीं, बल्कि धन के स्रोत की है। अमेरिका और जापान जैसे देशों में, निजी क्षेत्र आरएंडडी फंडिंग में 70% से 80% का योगदान देता है। इससे यह सुनिश्चित होता है कि शोध बाजार की मांगों के अनुरूप हो। भारत में, सरकार लगभग 60% खर्च वहन करती है, जो मुख्य रूप से ISRO, DRDO और परमाणु ऊर्जा जैसे रणनीतिक क्षेत्रों में जाता है। इससे एक 'साइलो प्रभाव' पैदा होता है जहाँ अकादमिक शोध केवल कागजों तक सीमित रह जाता है।
"प्रयोगशाला की सफलता और व्यावसायिक उत्पाद के बीच का पुल निजी पूंजी से बनता है; इसके बिना, भारत केवल विदेशी तकनीक का उपभोक्ता बनकर रह जाएगा।"
यह अंतराल विशेष रूप से 'डीप-टेक' क्षेत्रों में खतरनाक है। क्वांटम कंप्यूटिंग, सेमीकंडक्टर्स और एडवांस्ड रोबोटिक्स जैसे क्षेत्रों में भारी शुरुआती पूंजी और लंबे समय तक धैर्य की आवश्यकता होती है। ये तकनीकें नासा (NASA) द्वारा विकसित 'टेक्नोलॉजी रेडिनेस लेवल' (TRL 1 से 9) का पालन करती हैं। निजी निवेश के बिना, भारत विदेशी आपूर्ति श्रृंखला व्यवधानों के प्रति रणनीतिक रूप से संवेदनशील बना रहेगा।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1: ANRF क्या है और इसकी फंडिंग वितरण चिंता का विषय क्यों है?
ANRF भारत की प्रमुख अनुसंधान फंडिंग संस्था है। चिंता यह है कि इसका 80% फंड केवल IITs को मिलता है, जिससे अन्य शोध संस्थान उपेक्षित रह जाते हैं।
प्रश्न 2: राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए निजी क्षेत्र की आरएंडडी फंडिंग क्यों महत्वपूर्ण है?
निजी फंडिंग स्वदेशी डीप-टेक (जैसे सेमीकंडक्टर्स) के विकास को तेज करती है, जिससे विदेशी आयात पर निर्भरता कम होती है।