सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और चुनाव आयोग से पूछा है कि ईवीएम वोटों की गिनती के लिए 'टोटलाइजर' पद्धति का उपयोग क्यों नहीं किया जा सकता, ताकि मतदाताओं की गोपनीयता बनी रहे और चुनाव बाद की हिंसा को रोका जा सके।

  • सुप्रीम कोर्ट ईवीएम वोटों की बूथ-वार गिनती के बजाय 'टोटलाइजर' पद्धति अपनाने पर विचार कर रहा है।
  • इसका मुख्य उद्देश्य राजनीतिक दलों को विशिष्ट बूथों के वोटिंग पैटर्न जानने से रोकना है ताकि हिंसा कम हो।
  • चुनाव आयोग (ECI) ने पारदर्शिता की कमी और वैधानिक ढांचे के अभाव का हवाला दिया है।

भारतीय चुनावी प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण मोड़ पर, मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने केंद्र सरकार और भारतीय चुनाव आयोग (ECI) से ईवीएम के माध्यम से दर्ज वोटों की गिनती के लिए "टोटलाइजर" प्रणाली शुरू करने की संभावना पर सवाल किए हैं।

अदालत विशेष रूप से यह जानना चाहती है कि क्या वर्तमान बूथ-वार गिनती पद्धति मतदाताओं को संभावित प्रतिशोध के खतरे में डालती है। 'टोटलाइजर' एक ऐसा तंत्र है जो ईवीएम के एक समूह (क्लस्टर) के वोटों को एक साथ गिनने की अनुमति देता है, जिसका अर्थ है कि परिणाम व्यक्तिगत बूथ के बजाय एक समूह के लिए घोषित किए जाते हैं। इससे किसी विशेष इलाके के वोटिंग पैटर्न को गुप्त रखा जा सकेगा।

यह क्यों महत्वपूर्ण है

BozokMedia के विश्लेषण के अनुसार, यह बहस चुनावी पारदर्शिता और मतदाता की गोपनीयता के बीच एक मौलिक संघर्ष को दर्शाती है। जबकि बूथ-वार गिनती उम्मीदवारों को विसंगतियों की जांच करने की अनुमति देती है, यह राजनीतिक दलों को उन क्षेत्रों की पहचान करने में मदद करती है जहाँ उन्हें समर्थन नहीं मिला, जिससे चुनाव के बाद हिंसा और उत्पीड़न का खतरा बढ़ जाता है। यदि इसे लागू किया जाता है, तो यह भारतीय चुनावों के ऑडिट के तरीके को पूरी तरह बदल देगा।

सुनवाई के दौरान, याचिकाकर्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय ने तर्क दिया कि टोटलाइजर मतदाताओं को चुनाव के बाद होने वाले उत्पीड़न से बचाएगा। उन्होंने सुझाव दिया कि यदि 14 ईवीएम को एक साथ जोड़कर गिना जाए, तो कोई भी पार्टी यह नहीं जान पाएगी कि किस विशिष्ट बूथ पर उसे कितना समर्थन मिला, जिससे लक्षित हिंसा की संभावना खत्म हो जाएगी।

टोटलाइजर प्रणाली की ओर बढ़ना भारतीय लोकतांत्रिक ढांचे में 'प्रक्रिया की पारदर्शिता' से 'मतदाता की सुरक्षा' की ओर एक ऐतिहासिक बदलाव होगा।

हालांकि, चुनाव आयोग ने इस पर अपनी शंकाएं व्यक्त की हैं। आयोग का प्रतिनिधित्व कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता डामा शेषाद्रि नायडू ने कहा कि सरकार द्वारा नियुक्त एक विशेषज्ञ समिति और मंत्रियों के समूह ने इस प्रस्ताव का विरोध किया था। चुनाव आयोग के हलफनामे में कहा गया है कि वर्तमान प्रणाली अधिक पारदर्शी है और टोटलाइजर के लिए आवश्यक कानूनी आधार मौजूद नहीं है।

जस्टिस बागची ने उल्लेख किया कि सिद्धांत रूप में टोटलाइजर गोपनीयता सुनिश्चित करने का एक अच्छा उपकरण है, लेकिन वैधानिक समर्थन की कमी एक बड़ी बाधा है। उन्होंने चुनाव संचालन नियम 1961 के नियम 59A का हवाला दिया, जो कुछ परिस्थितियों में मतपत्रों (बैलेट पेपर) की गिनती के लिए टोटलाइजर की अनुमति देता है, और सवाल उठाया कि यही प्रावधान ईवीएम के लिए क्यों नहीं हो सकता।

विशेषता बूथ-वार गिनती (वर्तमान) टोटलाइजर पद्धति (प्रस्तावित)
पारदर्शिता उच्च (प्रत्येक बूथ का परिणाम सार्वजनिक) मध्यम (एकत्रित परिणाम)
मतदाता गोपनीयता कम (पैटर्न की पहचान संभव) उच्च (गुमनाम परिणाम)
हिंसा का जोखिम अधिक (लक्षित उत्पीड़न) कम (पैटर्न गुप्त)
क्या आप जानते हैं?: विधि आयोग ने अपनी 255वीं रिपोर्ट में इलेक्ट्रॉनिक युग में मतपत्र की गोपनीयता बढ़ाने के लिए टोटलाइजर प्रणाली शुरू करने की सिफारिश की थी।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रश्न 1: चुनावों के संदर्भ में टोटलाइजर क्या है?
टोटलाइजर एक ऐसी प्रणाली है जो परिणामों की घोषणा से पहले कई ईवीएम के वोटों को एक साथ जोड़ देती है, जिससे बूथ-विशिष्ट डेटा का खुलासा नहीं होता।

प्रश्न 2: चुनाव आयोग टोटलाइजर पद्धति का विरोध क्यों कर रहा है?
चुनाव आयोग का तर्क है कि इससे गिनती प्रक्रिया की पारदर्शिता कम हो सकती है और इसे लागू करने के लिए वर्तमान में कोई कानूनी ढांचा नहीं है।