कर्नाटक सरकार ने सूखे की गंभीर स्थिति से निपटने के लिए ₹28.52 करोड़ की लागत वाला क्लाउड सीडिंग कार्यक्रम शुरू किया है। जल संसाधन मंत्री एन. चेलुवरयस्वामी ने बेंगलुरु के HAL हवाई अड्डे से विशेष विमानों को रवाना किया।

  • कर्नाटक सरकार ने सूखे की स्थिति के बीच ₹28.52 करोड़ का क्लाउड सीडिंग प्रोजेक्ट लॉन्च किया।
  • विशेष रूप से सुसज्जित विमानों का उपयोग करके बादलों में रसायनों का छिड़काव किया जाएगा।
  • तकनीकी टीम डॉप्लर रडार के माध्यम से उपयुक्त बादलों की पहचान कर संचालन करेगी।

कर्नाटक में मानसून की कमी और बढ़ते सूखे के संकट के बीच, राज्य सरकार ने बारिश लाने के लिए एक महत्वाकांक्षी क्लाउड सीडिंग (Cloud Seeding) कार्यक्रम की शुरुआत की है। शुक्रवार को बेंगलुरु के HAL हवाई अड्डे पर जल संसाधन मंत्री एन. चेलुवरयस्वामी ने विशेष रूप से सुसज्जित विमानों को इस अभियान के लिए रवाना किया।

सरकार ने इस पूरे ऑपरेशन के लिए ₹28.52 करोड़ का बजट आवंटित किया है। मंत्री चेलुवरयस्वामी ने स्वीकार किया कि पिछले प्रयासों में सफलता की दर केवल 35% रही थी, लेकिन उन्होंने जोर देकर कहा कि जल उपलब्धता बढ़ाने के लिए हर संभव प्रयास करना अनिवार्य है। यदि इस महीने के अंत तक पर्याप्त पेयजल का भंडारण नहीं किया गया, तो राज्य को अगले वर्ष जून तक भीषण जल संकट का सामना करना पड़ सकता है।

Why This Matters

BozokMedia विश्लेषण के अनुसार, कर्नाटक की यह पहल न केवल कृषि संकट को कम करने के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि यह शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में जल सुरक्षा सुनिश्चित करने की दिशा में एक बड़ा कदम है। मानसून की विफलता से जलाशयों का जलस्तर गिर रहा है, जिससे भविष्य में बड़े पैमाने पर सामाजिक-आर्थिक अस्थिरता पैदा हो सकती है।

कृत्रिम वर्षा एक विज्ञान है जिसमें सफलता की गारंटी नहीं है, लेकिन सूखे की स्थिति में यह एक महत्वपूर्ण सुरक्षा जाल के रूप में कार्य करती है।

इस ऑपरेशन की निगरानी के लिए एक विशेष समिति गठित की गई है। एक तकनीकी सलाहकार और मूल्यांकन समिति हर दो घंटे में अपडेट प्रदान करेगी। यह अभियान पहले से तय जिलों के बजाय डॉप्लर रडार द्वारा पहचाने गए उन क्षेत्रों पर केंद्रित होगा जहाँ नमी युक्त 'क्यूमलोनिम्बस' बादल मौजूद हैं।

तकनीकी प्रक्रिया: यह कैसे काम करता है?

क्लाउड सीडिंग की प्रक्रिया में बादलों के भीतर रसायनों का छिड़काव किया जाता है ताकि वे नमी को बारिश में बदल सकें। उपयोग किए जाने वाले रसायनों में सिल्वर आयोडाइड, पोटेशियम आयोडाइड, ड्राई आइस और सोडियम क्लोराइड शामिल हैं। रसायनों का चयन बादलों के तापमान (गर्म या ठंडे) के आधार पर किया जाता है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

भारत के कई राज्यों ने पिछले दशक में सूखे के दौरान क्लाउड सीडिंग का सहारा लिया है। हालांकि यह तकनीक प्रभावी है, लेकिन इसकी सफलता काफी हद तक वायुमंडलीय परिस्थितियों और बादलों की संरचना पर निर्भर करती है। कर्नाटक के लिए यह कदम मानसून की अनिश्चितता के कारण उठाया गया है।

Did You Know?: क्लाउड सीडिंग में इस्तेमाल होने वाले सिल्वर आयोडाइड के कण बादलों में बर्फ के क्रिस्टल बनने की प्रक्रिया को तेज कर देते हैं।

Frequently Asked Questions

1. कर्नाटक सरकार ने इस परियोजना पर कितना खर्च किया है?
सरकार ने इस क्लाउड सीडिंग कार्यक्रम के लिए ₹28.52 करोड़ का अनुमानित बजट रखा है।

2. क्या क्लाउड सीडिंग से बारिश होना निश्चित है?
नहीं, यह पूरी तरह से मौसम की स्थिति पर निर्भर करता है। मंत्री के अनुसार, पिछले प्रयासों में सफलता दर 35% रही थी।