केरल के प्रमुख मुस्लिम धर्मगुरु ए.पी. अबूबकर मुसलीयार ने महिलाओं के सार्वजनिक जीवन में भागीदारी पर की गई अपनी विवादित टिप्पणी के लिए खेद व्यक्त किया है। उन्होंने अपने अनुयायियों से शांति बनाए रखने की अपील की है, जबकि सीपीआई(एम) सहित कई नेताओं ने उनके रुख की आलोचना की है।
- प्रमुख मुस्लिम धर्मगुरु ए.पी. अबूबकर मुसलीयार ने महिलाओं की सार्वजनिक भूमिका पर विवादित बयान के बाद माफी मांगी।
- मुसलीयार ने अपने समर्थकों से 'संयम' बरतने और विवादों में न फंसने की अपील की है।
- सीपीआई(एम) और अन्य राजनीतिक नेताओं ने उनके रूढ़िवादी विचारों की कड़ी निंदा की है।
- विवाद तब शुरू हुआ जब मुसलीयार ने कहा कि महिलाओं का घर तक सीमित रहना चाहिए।
केरल के प्रतिष्ठित मुस्लिम धर्मगुरु ए.पी. अबूबकर मुसलीयार, जिन्हें 'कांथपुरम' के नाम से भी जाना जाता है, ने महिलाओं के सार्वजनिक क्षेत्र में प्रवेश को लेकर दिए गए अपने हालिया बयानों के बाद उत्पन्न हुए विवाद पर खेद व्यक्त किया है। शुक्रवार को जारी एक बयान में, उन्होंने अपने अनुयायियों से संयम बरतने का आह्वान किया और कहा कि चर्चाओं को विचारों के निष्पक्ष मूल्यांकन का एक स्वस्थ मंच होना चाहिए।
यह पूरा विवाद तब शुरू हुआ जब मुसलीयार ने ईद और ओणम के उत्सवों के दौरान मुस्लिम महिलाओं की सार्वजनिक भागीदारी पर टिप्पणी की थी। उन्होंने कहा था, "कुरान सिखाता है कि महिलाओं को शांति से अपने घरों तक सीमित रहना चाहिए। यदि महिलाएं इस तरह सार्वजनिक क्षेत्र में प्रवेश करती हैं, तो इससे भारी विनाश होगा।" उनके इस बयान ने केरल के सामाजिक और राजनीतिक हलकों में एक बड़ी बहस छेड़ दी है।
राजनीतिक प्रतिक्रिया और आलोचना
मुसलीयार के बयानों की केरल के मुख्यमंत्री वी.डी. सतीशन सहित कई नेताओं ने निंदा की है। हालांकि, कांग्रेस के सहयोगी दल यूएमएल (IUML) ने शुरुआत में इस मामले में रक्षात्मक रुख अपनाया, लेकिन बाद में सीपीआई(एम) ने भी उनके विचारों का कड़ा विरोध किया। सीपीआई(एम) की नेता पी.के. सैनाबा ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि मुस्लिम समुदाय की महिलाएं अब काफी बदल चुकी हैं और वे सामाजिक जीवन जीने के लिए स्वतंत्र हैं।
सैनाबा ने पैगंबर की पत्नी आयशा का उदाहरण देते हुए तर्क दिया कि यदि वे नेतृत्व कर सकती थीं, तो आज की महिलाओं को भी संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकारों और स्वतंत्रता का आनंद लेने से क्यों रोका जा सकता है? वहीं, यूएमएल की वरिष्ठ नेता नूरबीना रशीद ने भी महिला सशक्तिकरण के बदलते स्वरूप पर चिंता व्यक्त की और कहा कि राजनीतिक दलों को महिलाओं की सार्वजनिक भागीदारी को लेकर स्पष्ट दृष्टिकोण रखना चाहिए।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और मुसलीयार का प्रभाव
94 वर्षीय ए.पी. अबूबकर मुसलीयार 'समस्त केरल जमीयतुल उलेमा' के महासचिव हैं, जो केरल में सुन्नी विद्वानों का एक अत्यंत शक्तिशाली संगठन है। उन्हें 'ग्रैंड मुफ्ती' की उपाधि भी दी जा चुकी है। मुसलीयार का प्रभाव केरल की धार्मिक और सामाजिक संरचना में बहुत गहरा है, क्योंकि उनके नेतृत्व वाला बोर्ड राज्य में सैकड़ों मदरसा संचालित करता है।
मुसलीयार अपने रूढ़िवादी विचारों के लिए जाने जाते रहे हैं। अतीत में, उन्होंने सह-शिक्षा (co-education) और महिलाओं के चुनाव लड़ने के खिलाफ भी रुख अपनाया है। हालांकि, वे व्यावसायिक क्षेत्रों में काफी सक्रिय रहे हैं और कोझिकोड में 'मर्कज नॉलेज सिटी' जैसे बड़े प्रोजेक्ट्स का नेतृत्व कर रहे हैं।
Why This Matters
BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि यह विवाद केवल धार्मिक टिप्पणियों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह केरल के बदलते सामाजिक ताने-बाने और धर्मनिरपेक्षता बनाम धार्मिक रूढ़िवादिता के बीच के संघर्ष को दर्शाता है। महिलाओं की सार्वजनिक भागीदारी पर यह बहस राज्य की भविष्य की राजनीति और सामाजिक प्रगति की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।
धार्मिक व्याख्याओं और संवैधानिक अधिकारों के बीच का यह टकराव केरल के सामाजिक विमर्श का एक नया केंद्र बन गया है।
Frequently Asked Questions
1. कांथपुरम मुसलीयार का विवाद क्या था?
मुसलीयार ने कहा था कि महिलाओं को केवल घरों तक सीमित रहना चाहिए और सार्वजनिक स्थानों पर उनकी उपस्थिति से समाज में विनाश हो सकता है।
2. इस बयान पर राजनीतिक प्रतिक्रिया क्या रही?
मुख्यमंत्री वी.डी. सतीशसन और सीपीआई(एम) ने इसकी निंदा की, जबकि यूएमएल ने महिला सशक्तिकरण के प्रति अपनी जिम्मेदारी पर चर्चा की।