पंजाब और हरियाणा में सैटेलाइट रीडिंग और जमीनी सत्यापन के बीच बड़े अंतर पाए जाने के बाद, वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) अपने 'बर्न एरिया' प्रोटोकॉल की फिर से जांच करेगा। इसका उद्देश्य दिल्ली-एनसीआर में सर्दियों के स्मॉग को रोकने के लिए पराली जलाने की निगरानी को सटीक बनाना है।
- CAQM और ISRO का NRSC आगामी खरीफ फसल के दौरान बर्न एरिया प्रोटोकॉल का पुन: परीक्षण करेंगे।
- पंजाब और हरियाणा में सैटेलाइट-आधारित MIRBI डेटा और जमीनी सत्यापन के बीच महत्वपूर्ण अंतर पाया गया।
- अक्टूबर-नवंबर के चरम दिनों में दिल्ली-एनसीआर के प्रदूषण में पराली जलाने का योगदान 35% तक होता है।
वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) ने अपने 'बर्न एरिया' (जले हुए क्षेत्र) मूल्यांकन प्रोटोकॉल के पुनर्मूल्यांकन की घोषणा की है। यह निर्णय तब लिया गया जब पंजाब और हरियाणा के कृषि क्षेत्रों में सैटेलाइट रीडिंग और जमीनी सत्यापन के बीच भारी अंतर सामने आया। यह विसंगति उन निगरानी प्रणालियों की सटीकता पर गंभीर सवाल उठाती है जिनका उपयोग फसल अवशेष जलाने की ट्रैकिंग के लिए किया जाता है।
इस तकनीकी अंतर को दूर करने के लिए, CAQM, भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के तहत नेशनल रिमोट सेंसिंग सेंटर (NRSC) के सहयोग से आगामी खरीफ फसल सीजन में फिर से परीक्षण करेगा। इसका उद्देश्य रिमोट सेंसिंग डेटा को भौतिक जमीनी हकीकत के साथ जोड़ना है ताकि प्रवर्तन कार्रवाई सटीक सबूतों पर आधारित हो।
यह क्यों महत्वपूर्ण है?
BozokMedia के विश्लेषण से पता चलता है कि सैटेलाइट 'ओवरपास विंडो' पर निर्भरता के कारण ऐतिहासिक रूप से कृषि आग की गिनती कम हुई है, एक ऐसी खामी जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने भी गौर किया है। यदि बर्न एरिया मूल्यांकन—जिसे इन समय अंतराल की कमियों को भरने के लिए बनाया गया था—भी गलत साबित होता है, तो सरकार प्रभावी रूप से प्रदूषण के खिलाफ एक 'अंधी लड़ाई' लड़ रही है। सटीक डेटा ही लक्षित दंड लगाने और विकल्पों के लिए प्रभावी सब्सिडी प्रदान करने का एकमात्र तरीका है।
वर्तमान प्रोटोकॉल मिड-इंफ्रारेड बर्न इंडेक्स (MIRBI) पद्धति का उपयोग करता है, जो यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी के Sentinel-2 सैटेलाइट के डेटा का लाभ उठाता है। यह प्रणाली हर 5-7 दिनों में 20 मीटर x 20 मीटर के स्थानिक रिज़ॉल्यूशन पर जले हुए पैच का पता लगाने के लिए डिज़ाइन की गई है। हालांकि, 2025 खरीफ और 2026 रबी सीजन ने खुलासा किया कि सैटेलाइट जो 'जला हुआ' क्षेत्र दिखाता है, वह हमेशा जमीन की वास्तविकता से मेल नहीं खाता।
"बर्न एरिया मैपिंग के सत्यापन में सुधार से उत्सर्जन भार और आग की तीव्रता की हमारी समझ मौलिक रूप से बदल जाएगी, जिससे प्रवर्तन कहीं अधिक सख्त और निष्पक्ष होगा।"
ऐतिहासिक रूप से, 15 सितंबर से 30 नवंबर की अवधि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) की वायु गुणवत्ता के लिए सबसे संवेदनशील होती है। इस दौरान, स्थिर हवाओं और बड़े पैमाने पर पराली जलाने के संयोजन से एक जहरीली स्मॉग परत बन जाती है। MIRBI प्रोटोकॉल को परिष्कृत करके, CAQM उस 'डेटा गैप' को खत्म करने की उम्मीद करता है जो अक्सर उल्लंघनकर्ताओं को पकड़े जाने से बचा लेता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1: सैटेलाइट डेटा और जमीनी डेटा के बीच अंतर क्यों है?
सैटेलाइट डेटा बादलों, वायुमंडलीय हस्तक्षेप या सैटेलाइट की कक्षा (ओवरपास विंडो) के विशिष्ट समय से प्रभावित हो सकता है, जबकि जमीनी सत्यापन में खेत का भौतिक निरीक्षण शामिल होता है।
प्रश्न 2: बर्न एरिया मूल्यांकन प्रोटोकॉल किसने विकसित किया?
यह प्रोटोकॉल NRSC, ISRO, भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI) और पंजाब एवं हरियाणा के राज्य रिमोट सेंसिंग केंद्रों द्वारा संयुक्त रूप से विकसित किया गया था।