पूर्व एयर मार्शल नर्मदेश्वर तिवारी ने कारगिल युद्ध की चुनौतियों से लेकर आधुनिक युग के AI-संचालित युद्ध कौशल तक के सफर का विस्तृत विश्लेषण किया है। उन्होंने बताया कि कैसे सटीक निशाने और रियल-टाइम डेटा ने युद्ध की परिभाषा बदल दी है।

  • कारगिल युद्ध में लेजर गाइडेड बमों ने सटीक निशाने लगाकर युद्ध का रुख बदल दिया था।
  • आधुनिक युद्ध अब केवल हथियारों की ताकत नहीं, बल्कि रियल-टाइम इन्फॉर्मेशन और नेटवर्किंग का खेल है।
  • IACCS जैसे सिस्टम्स और AI अब खतरों की पहचान और निर्णय लेने की प्रक्रिया को तेज कर रहे हैं।

आजतक के विशेष कार्यक्रम ‘सुरक्षा सभा’ के सत्र ‘वर्दी, वीरता, विजय’ में पूर्व वाइस चीफ ऑफ एयर स्टाफ, एयर मार्शल नर्मदेश्वर तिवारी (सेवानिवृत्त) ने भारतीय वायुसेना के तकनीकी विकास पर गहरा प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि 1999 के कारगिल युद्ध से लेकर हालिया सैन्य ऑपरेशनों तक, युद्ध लड़ने के तरीकों में आमूल-चूल परिवर्तन आया है।

कारगिल की चुनौतियां और लेजर तकनीक का उदय

कारगिल युद्ध के दौरान, वायुसेना के सामने सबसे बड़ी चुनौती 15,000 फीट से अधिक की ऊंचाई पर स्थित छोटे बंकरों को निशाना बनाना था। एयर मार्शल तिवारी ने याद किया कि शुरुआती दिनों में विमानों को काफी जोखिम उठाना पड़ा क्योंकि दुश्मन ऊंचाई पर बैठा था। कम ऊंचाई पर हमला करना आत्मघाती था और अधिक ऊंचाई से सटीक निशाना लगाना लगभग असंभव था।

यहीं पर लेजर गाइडेड बम (LGB) और लेजर डिजाइनशन तकनीक ने निर्णायक भूमिका निभाई। इस तकनीक ने विमानों को टारगेट को ज़ूम करके देखने और एक लेजर बीम के माध्यम से बम को सटीक रूप से निर्देशित करने की क्षमता दी। यदि बम कुछ मीटर भी इधर-उधर गिरता, तो वह बेकार जाता या अपने ही सैनिकों के लिए खतरा बन जाता। लेजर तकनीक ने इस जोखिम को समाप्त कर दिया।

Why This Matters

BozokMedia विश्लेषण के अनुसार, कारगिल युद्ध ने भारत को यह सिखाया कि आधुनिक युद्ध में 'सटीकता' (Precision) ही असली ताकत है। यह केवल सैन्य जीत नहीं थी, बल्कि भारतीय रक्षा तंत्र के लिए एक तकनीकी मोड़ था जिसने भविष्य के 'नेटवर्क सेंट्रिक वारफेयर' की नींव रखी।

"आज का युद्ध मूल रूप से इन्फॉर्मेशन का युद्ध है; जिसके पास सही जानकारी है और जो उसे तेजी से इस्तेमाल कर सकता है, वही विजयी होगा।"

ऑपरेशन सिंदूर और नेटवर्किंग का युग

कारगिल से ऑपरेशन सिंदूर तक के सफर में सबसे बड़ा बदलाव इंटीग्रेटेड एयर कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम (IACCS) का विकास है। यह सिस्टम पिछले दो दशकों की मेहनत का परिणाम है। अब रडार, हथियार प्रणालियां और कमांड सेंटर एक साझा नेटवर्क से जुड़े हैं, जिससे सभी कमांडरों को एक ही समय में एक जैसी 'कॉमन एयर पिक्चर' मिलती है।

विशेषता कारगिल युग (1999) आधुनिक युग (ऑपरेशन सिंदूर/AI)
निशाना लगाने की तकनीक प्रारंभिक लेजर गाइडेड बम AI-संचालित सटीक प्रहार
सूचना का प्रवाह सीमित और धीमी संचार प्रणाली रियल-टाइम नेटवर्किंग (IACCS)
खतरे की पहचान मैनुअल रडार विश्लेषण AI आधारित ऑटोमेटेड पहचान

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की भूमिका

भविष्य के युद्धों में AI केवल एक सहायक नहीं, बल्कि एक रणनीतिक संपत्ति होगा। एयर मार्शल तिवारी ने बताया कि रडार पर दिखने वाला एक छोटा 'ब्लिप' वास्तव में क्या है—एक लड़ाकू विमान, क्रूज मिसाइल या ड्रोन—यह पहचानने में AI मदद करता है। यह सिस्टम न केवल खतरे की पहचान करता है, बल्कि यह भी अनुमान लगाता है कि वह हथियार किस क्षेत्र को निशाना बना सकता है।

क्या आप जानते हैं?: कारगिल युद्ध के दौरान भारतीय वायुसेना ने पहली बार बड़े पैमाने पर लेजर गाइडेड बमों का उपयोग किया था, जिसने पहाड़ों की दुर्गमता को बेअसर कर दिया था।

Frequently Asked Questions

प्रश्न 1: IACCS सिस्टम का मुख्य लाभ क्या है?
उत्तर: यह सभी रडार और हथियार प्रणालियों को एक नेटवर्क में जोड़ता है, जिससे निर्णय लेने की प्रक्रिया तेज होती है और बेहतर तालमेल बनता है।

प्रश्न 2: क्या AI युद्ध में इंसानों की जगह ले लेगा?
उत्तर: नहीं, AI का उद्देश्य इंसानों को हटाना नहीं, बल्कि उनकी निर्णय लेने की क्षमता को और अधिक सटीक और तेज बनाना है।