पूर्व डीआरडीओ चेयरमैन जी सतीश रेड्डी ने सुरक्षा सभा में बताया कि भविष्य के युद्धों में भारी टैंकों और लड़ाकू विमानों के साथ-साथ कम लागत वाले स्वायत्त (autonomous) सिस्टम की भूमिका निर्णायक होगी। उन्होंने रक्षा निर्यात में भारत की बढ़ती ताकत और आत्मनिर्भरता पर भी जोर दिया।
- भविष्य के युद्ध में भारी युद्धक प्लेटफॉर्म और कम लागत वाले स्वायत्त ड्रोन का संतुलन जरूरी होगा।
- भारत का रक्षा निर्यात 23,666 करोड़ से बढ़कर लगभग 29,450 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है।
- डीसीपीपी (DCPP) मॉडल के माध्यम से रक्षा उत्पादन का समय 12 साल से घटकर 4 साल रह गया है।
- सेमीकंडक्टर, सेंसर और एयरो-इंजन में स्वदेशीकरण पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।
नई दिल्ली में आयोजित 'सुरक्षा सभा' के दौरान पूर्व डीआरडीओ (DRDO) चेयरमैन जी सतीश रेड्डी ने आधुनिक युद्धनीति के बदलते स्वरूप पर एक महत्वपूर्ण दृष्टिकोण प्रस्तुत किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि हालांकि विमान, पनडुब्बी, डिस्ट्रॉयर और टैंक जैसे पारंपरिक प्लेटफॉर्म रणनीतिक गहराई के लिए अपरिहार्य रहेंगे, लेकिन युद्ध के मैदान में अब 'एसिमेट्रिक वारफेयर' का बोलबाला होगा।
रेड्डी के अनुसार, यूक्रेन और अन्य वैश्विक संघर्षों ने यह सिद्ध कर दिया है कि भविष्य की जीत केवल भारी हथियारों से नहीं, बल्कि लो-कॉस्ट ऑटोनॉमस सिस्टम (कम लागत वाले स्वायत्त सिस्टम) के प्रभावी उपयोग से मिलेगी। ये ड्रोन और स्वायत्त प्रणालियाँ तेजी से प्रतिक्रिया करने और बड़े पैमाने पर तैनाती की सुविधा प्रदान करती हैं, जो पारंपरिक प्लेटफार्मों के पूरक के रूप में कार्य करेंगी।
रक्षा उत्पादन में क्रांतिकारी बदलाव
भारत के रक्षा पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। पूर्व चेयरमैन ने बताया कि पहले डीआरडीओ केवल डिजाइन और विकास तक सीमित था, लेकिन अब 'डेवलपमेंट-कम-प्रोडक्शन पार्टनर' (DCPP) मॉडल के तहत उद्योग जगत निर्माण प्रक्रिया के शुरुआती चरण से ही शामिल हो जाता है। इस एक बदलाव ने मिसाइल और रक्षा प्रणालियों के विकास चक्र को 12 साल से घटाकर मात्र 4 साल कर दिया है।
पारंपरिक युद्धक क्षमता और कम लागत वाली स्वायत्त तकनीक का सही संतुलन ही भविष्य के युद्धों में भारत को बढ़त दिलाएगा।
वर्तमान में भारत में 2,000 से अधिक रक्षा उद्योग सक्रिय हैं। टियर-वन और टियर-टू कंपनियां अब केवल पुर्जे नहीं बना रही हैं, बल्कि खुद के सिस्टम डिजाइन कर रही हैं। एलसीए (LCA) और हल्के टैंकों जैसे महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट्स में निजी क्षेत्र की भागीदारी ने आत्मनिर्भरता को नई ऊंचाइयों पर पहुँचा दिया है।
बढ़ता रक्षा निर्यात और वैश्विक प्रभाव
भारत अब केवल एक आयातक नहीं, बल्कि एक प्रमुख निर्यातक के रूप में उभर रहा है। रक्षा निर्यात में भारी उछाल आया है, जो पिछले वर्ष 23,666 करोड़ रुपये से बढ़कर अब लगभग 29,450 करोड़ रुपये के करीब पहुंच गया है। पिनाका रॉकेट सिस्टम और आकाश मिसाइल जैसी प्रणालियों की वैश्विक मांग भारत की बढ़ती तकनीकी शक्ति का प्रमाण है।
स्पेस और आर्थिक बुनियादी ढांचे की सुरक्षा
रेड्डी ने चेतावनी दी कि युद्ध का दायरा अब केवल जमीनी मैदान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह स्पेस और आर्थिक बुनियादी ढांचे (जैसे तेल भंडारण और ईंधन टर्मिनल) तक फैल गया है। भारत ने 2019 में अपने एंटी-सैटेलाइट परीक्षण के माध्यम से यह सिद्ध कर दिया है कि वह अंतरिक्ष में अपनी संपत्तियों की रक्षा करने में सक्षम है।
Frequently Asked Questions
1. भविष्य के युद्ध में ड्रोन की क्या भूमिका होगी?
ड्रोन और स्वायत्त सिस्टम कम लागत में तेजी से प्रतिक्रिया देने और बड़े पैमाने पर तैनाती के लिए महत्वपूर्ण होंगे।
2. भारत रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर कैसे बन रहा है?
डीसीपीपी मॉडल, स्टार्टअप्स के सहयोग और स्वदेशी अनुसंधान (R&D) के माध्यम से भारत अपनी निर्भरता कम कर रहा है।