सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस संदीप मेहता ने CJI को चौथे पत्र में पूर्व कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश संजीव प्रकाश शर्मा पर भ्रष्टाचार, प्रशासनिक दुरुपयोग और न्यायिक जांच में हस्तक्षेप के गंभीर आरोप लगाए हैं।

  • जस्टिस संदीप मेहता ने CJI सूर्यकांत को जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा के खिलाफ चार अलग-अलग पत्र भेजे हैं।
  • नए आरोपों में अश्लील तस्वीरों से जुड़े एक संवेदनशील आंतरिक मामले की जांच में हस्तक्षेप और गोपनीयता भंग करने का दावा किया गया है।
  • जस्टिस संजय कुमार अग्रवाल ने आधिकारिक तौर पर राजस्थान उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के रूप में पदभार संभाल लिया है।
  • जस्टिस शर्मा ने सभी आरोपों को निराधार और व्यक्तिगत द्वेष से प्रेरित बताते हुए खारिज कर दिया है।

राजस्थान उच्च न्यायालय इस समय एक गंभीर न्यायिक विवाद के केंद्र में है। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस संदीप मेहता ने पूर्व कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा के खिलाफ गंभीर आरोप लगाते हुए न्यायपालिका की आंतरिक कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। 30 अगस्त को भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत को लिखे चौथे पत्र में, जस्टिस मेहता ने जस्टिस शर्मा के कार्यों को "मनमाना, संदिग्ध और स्पष्ट रूप से तानाशाही" बताया है।

इन खुलासों का समय राजस्थान उच्च न्यायालय में नेतृत्व परिवर्तन के साथ मेल खाता है। सोमवार को राज्यपाल हरिभाऊ बागड़े ने संजय कुमार अग्रवाल को राजस्थान उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के रूप में शपथ दिलाई। उल्लेखनीय है कि सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने जस्टिस शर्मा के छुट्टी पर जाने के एक घंटे के भीतर ही जस्टिस अग्रवाल के नाम की सिफारिश कर दी थी, जो इस विवाद के बीच एक त्वरित प्रशासनिक कदम प्रतीत होता है।

आरोपों की गंभीरता

जहाँ पिछले पत्रों में शक्तियों के दुरुपयोग और ईमानदारी पर संदेह जताया गया था, वहीं नवीनतम पत्र में विशिष्ट प्रशासनिक विफलताओं का जिक्र है। जस्टिस मेहता का आरोप है कि जस्टिस शर्मा ने एक न्यायिक अधिकारी के खिलाफ चल रही जांच में सीधा हस्तक्षेप किया, जिस पर अपने एक महिला सहकर्मी की अश्लील तस्वीरें मोबाइल में रखने का आरोप था। पत्र के अनुसार, तीन महिला न्यायाधीशों वाली शिकायत समिति ने यह दर्ज किया कि मुख्य न्यायाधीश के हस्तक्षेप ने जांच की स्वतंत्रता को प्रभावित किया है।

न्यायिक प्रशासन में नैतिकता को लेकर दो उच्च पदस्थ न्यायाधीशों के बीच का यह टकराव भारतीय उच्च न्यायालयों के आंतरिक जवाबदेही तंत्र के लिए एक बड़ी परीक्षा है।

इसके अलावा, जस्टिस मेहता ने दावा किया कि इस संवेदनशील जांच के गोपनीय रिकॉर्ड रजिस्ट्री अधिकारियों और अन्य न्यायिक कर्मचारियों के साथ साझा किए गए, जो प्रोटोकॉल का गंभीर उल्लंघन है। उन्होंने तर्क दिया कि जस्टिस शर्मा के "तानाशाही कामकाज के तरीके" ने उच्च न्यायालय की संस्थागत गरिमा को अपूरणीय क्षति पहुँचाई है।

यह मामला क्यों महत्वपूर्ण है?

BozokMedia विश्लेषण के अनुसार, यह केवल दो न्यायाधीशों के बीच का व्यक्तिगत विवाद नहीं है, बल्कि उच्च न्यायालय प्रशासन के भीतर 'चेक एंड बैलेंस' की व्यवस्था पर एक गंभीर चेतावनी है। जब सुप्रीम कोर्ट का एक न्यायाधीश बार-बार CJI को संस्थागत तंत्र के टूटने की चेतावनी देता है, तो यह सवाल उठता है कि न्यायपालिका अपने भीतर के भ्रष्टाचार और प्रशासनिक अतिरेक को कैसे संभालती है।

दूसरी ओर, जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा ने अपनी बेगुनाही का दावा किया है। 2 सितंबर को जारी एक बयान में उन्होंने इन आरोपों को "निराधार" और "द्वेषपूर्ण" बताया। उन्होंने कहा कि उन्होंने CJI के समक्ष सबूत पेश किए हैं और मीडिया व वकीलों से धैर्य बनाए रखने की अपील की है।

क्या आप जानते हैं?: सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम वह निकाय है जो भारत में न्यायाधीशों की नियुक्ति और स्थानांतरण के लिए जिम्मेदार है, जो न्यायिक स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए एक स्व-नियामक प्रणाली के रूप में कार्य करता है।
पक्ष जस्टिस संदीप मेहता के दावे जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा का पक्ष
प्रशासनिक आचरण तानाशाही और भ्रष्ट पेशेवर और कानून आधारित
आंतरिक जांच यौन उत्पीड़न जांच में हस्तक्षेप का आरोप आरोपों को पूरी तरह निराधार बताया
संस्थागत प्रभाव उच्च न्यायालय को अपूरणीय क्षति भारतीय न्यायिक प्रणाली में पूर्ण विश्वास

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रश्न 1: राजस्थान उच्च न्यायालय के वर्तमान मुख्य न्यायाधीश कौन हैं?
जस्टिस संजय कुमार अग्रवाल ने हाल ही में जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा की जगह मुख्य न्यायाधीश के रूप में शपथ ली है।

प्रश्न 2: जस्टिस मेहता के चौथे पत्र का मुख्य आधार क्या है?
चौथा पत्र मुख्य रूप से अश्लील तस्वीरों से संबंधित न्यायिक जांच में कथित हस्तक्षेप और प्रशासनिक गोपनीयता के उल्लंघन पर केंद्रित है।