सुप्रीम कोर्ट ने ब्लैक सी में तीन भारतीय नाविकों की कथित मृत्यु के संबंध में एक जनहित याचिका पर सुनवाई की, जिसमें केंद्र सरकार के बचाव प्रयासों और मुआवजे की प्रक्रिया पर सवाल उठाए गए हैं।
- सुप्रीम कोर्ट ने ब्लैक सी में तीन भारतीय नाविकों की मौत के मामले में PIL पर सुनवाई की।
- सीजेआई ने विदेशी क्षेत्र में बचाव कार्यों की सीमाओं पर चर्चा की।
- केंद्र सरकार ने कहा कि बिना मृत्यु प्रमाण पत्र के मुआवजा देना संभव नहीं है।
- याचिकाकर्ता ने नाविकों को युद्धग्रस्त क्षेत्रों में भेजने के अनुबंधों की जांच की मांग की।
नई दिल्ली: रूस और यूक्रेन के बीच जारी भीषण युद्ध के बीच, सुप्रीम कोर्ट ने एक अत्यंत संवेदनशील मामले की सुनवाई की। यह मामला ब्लैक सी (काला सागर) में हुए हमलों के दौरान तीन भारतीय नाविकों की कथित मृत्यु से जुड़ा है। अदालत में पेश की गई जनहित याचिका (PIL) में आरोप लगाया गया है कि भारत सरकार और संबंधित देशों ने इन नाविकों की तलाश और उनके परिवारों की सहायता के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाए हैं।
सुनवाई के दौरान, याचिकाकर्ता के वकील ने दावा किया कि विदेश मंत्रालय (MEA) ने नाविकों के भाग्य का पता लगाने में ढिलाई बरती है। उन्होंने कोर्ट को बताया कि रोमानियाई राजदूत के अनुसार, 26 जुलाई के बाद कोई खोज और बचाव अभियान (Search-and-Rescue) नहीं चलाया गया। इस पर केंद्र सरकार ने स्पष्ट किया कि भारतीय दूतावास यूक्रेन, रोमानिया और अन्य संबंधित देशों के साथ निरंतर संपर्क में हैं।
BozokMedia विश्लेषण के अनुसार, यह मामला केवल तीन नाविकों की जान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में काम करने वाले हजारों भारतीय समुद्री कर्मियों की सुरक्षा और उनके अधिकारों का मुद्दा है। जब निजी शिपिंग कंपनियां नाविकों को युद्धग्रस्त क्षेत्रों जैसे कि रेड सी या ब्लैक सी में भेजती हैं, तो अक्सर सुरक्षा प्रोटोकॉल की अनदेखी की जाती है। यह मामला इस बात पर कानूनी मिसाल कायम करेगा कि क्या सरकार इन निजी अनुबंधों में हस्तक्षेप कर सकती है।
भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) ने स्थिति की गंभीरता को स्वीकार करते हुए इसे एक "दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति" बताया, लेकिन साथ ही विदेशी संप्रभुता की सीमाओं की ओर इशारा किया। उन्होंने चुटकी लेते हुए पूछा, "क्या आप चाहते हैं कि हम दिल्ली पुलिस को यूक्रेन भेजें?"
"युद्धग्रस्त क्षेत्रों में नाविकों की तैनाती के अनुबंधों की कानूनी जांच अनिवार्य है ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि उन्हें जबरन खतरे में नहीं डाला गया।"
केंद्र के वकील जे. बागची ने तर्क दिया कि चूंकि किसी भी देश ने औपचारिक रूप से युद्ध की घोषणा नहीं की है, इसलिए जेनेवा कन्वेंशन को उस तरह से लागू नहीं किया जा सकता जैसा याचिकाकर्ता चाहते हैं। उन्होंने कहा कि सरकार केवल शिपिंग कंपनियों से मुआवजा दिलाने में मदद कर सकती है, लेकिन इसके लिए मृत्यु प्रमाण पत्र अनिवार्य है।
याचिकाकर्ता ने कोर्ट से आग्रह किया कि उन अनुबंधों (Employment Contracts) की जांच की जाए जिनके तहत नाविकों को स्ट्रेट ऑफ होर्मुज, रेड सी और ब्लैक सी जैसे खतरनाक क्षेत्रों में भेजा गया। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या नाविकों को इन क्षेत्रों में जाने के लिए मजबूर किया गया था।
1. सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में केंद्र सरकार से क्या पूछा?
कोर्ट ने पूछा कि क्या सरकार केवल एजेंसी की अक्षमता बताएगी या प्रभावित परिवारों को मुआवजा दिलाने में सहायता करेगी।
2. मुआवजा मिलने में मुख्य बाधा क्या है?
केंद्र सरकार के अनुसार, आधिकारिक मृत्यु प्रमाण पत्र (Death Certificate) के बिना मुआवजा प्रक्रिया शुरू करना संभव नहीं है।