भारत की अध्यक्षता में दिल्ली में होने वाले 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन पर दुनिया की नजरें टिकी हैं। वैश्विक तनाव और आंतरिक मतभेदों के बीच, भारत एक साझा एजेंडा तैयार कर उभरती अर्थव्यवस्थाओं का नेतृत्व करने की कोशिश कर रहा है।

  • भारत 12-13 सितंबर को दिल्ली में 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेजबानी करेगा।
  • रूस-यूक्रेन और ईरान-इजरायल युद्धों के कारण सदस्य देशों के बीच गहरे आंतरिक मतभेद हैं।
  • अमेरिका की 'ऑपरेशन इकोनॉमिक आउटकास्ट' नीति ईरान को अलग-थलग करने की कोशिश है, जो ब्रिक्स के लिए चुनौती है।
  • भारत का लक्ष्य ब्रिक्स न्यू डेवलपमेंट बैंक को मजबूत करना और वैश्विक शासन में सुधार लाना है।

भारत की अध्यक्षता में आगामी 12-13 सितंबर को नई दिल्ली में 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन का आयोजन होने जा रहा है। भारत ने इस आयोजन को सफल बनाने के लिए जनवरी से ही 350 से अधिक बैठकों का सिलसिला शुरू किया है। 2023 के जी20 शिखर सम्मेलन की सफलता के अनुभव का लाभ उठाते हुए, भारतीय अधिकारी इस सम्मेलन को एक प्रमुख अंतरराष्ट्रीय मील के पत्थर के रूप में स्थापित करने में जुटे हैं।

ब्रिक्स कोई औपचारिक संधि आधारित संगठन नहीं है, बल्कि यह विभिन्न वैश्विक मुद्दों पर चर्चा करने और समाधान खोजने के लिए एक अनौपचारिक मंच है। पिछले दो दशकों में इसने खुद को उभरती अर्थव्यवस्थाओं की एक शक्तिशाली आवाज के रूप में स्थापित किया है। जहाँ जी7 और जी20 जैसे समूह अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, वहीं ब्रिक्स ग्लोबल साउथ के लिए एक महत्वपूर्ण केंद्र बनकर उभरा है।

Why This Matters

BozokMedia analysis shows कि यह शिखर सम्मेलन केवल राजनयिक शिष्टाचार नहीं, बल्कि भू-राजनीतिक संतुलन की परीक्षा है। वर्तमान में दुनिया गहरे विभाजन का सामना कर रही है। एक तरफ रूस और ईरान जैसे सदस्य हैं जो पश्चिमी देशों के विरोध में हैं, वहीं दूसरी तरफ सऊदी अरब और यूएई जैसे नए सदस्य हैं जिनके संबंध अमेरिका के साथ घनिष्ठ हैं। भारत के लिए चुनौती इन परस्पर विरोधी हितों के बीच एक 'साझा न्यूनतम कार्यक्रम' तैयार करना है।

"ब्रिक्स की असली ताकत उसकी विविधता में है, लेकिन यही विविधता वर्तमान वैश्विक युद्धों के दौर में इसकी सबसे बड़ी कमजोरी भी बन गई है।"

सम्मेलन के सामने छह प्रमुख चुनौतियां हैं। सबसे बड़ी चुनौती रूस-यूक्रेन और ईरान-इजरायल संघर्षों में मध्यस्थता की है। चूंकि रूस और ईरान खुद सदस्य हैं, इसलिए समूह के भीतर स्पष्टता का अभाव है। इसके अलावा, अमेरिका के वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट द्वारा घोषित 'ऑपरेशन इकोनॉमिक आउटकास्ट' ईरान की आर्थिक कमर तोड़ने की कोशिश है, जिससे ब्रिक्स देशों पर अमेरिका या ईरान में से किसी एक को चुनने का दबाव बढ़ेगा।

इसके अलावा, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में सुधारों पर भी चर्चा होगी। हालांकि, दक्षिण अफ्रीका की स्थायी सदस्यता की दावेदारी पर मिस्र और इथियोपिया जैसे अफ्रीकी देशों की आपत्तियां भारत और ब्राजील की उम्मीदों को प्रभावित कर सकती हैं। भारत इस मंच का उपयोग रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy) को मजबूत करने और ग्लोबल साउथ के मार्गदर्शक के रूप में अपनी छवि निखारने के लिए करेगा।

अंततः, ब्रिक्स न्यू डेवलपमेंट बैंक (NDB) को मजबूत करना और व्यापारिक भुगतान प्रणालियों को सरल बनाना प्राथमिकता होगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पहले ही स्पष्ट किया है कि 'मानवता का कल्याण' ही इस समूह का सर्वोच्च लक्ष्य होना चाहिए।

strong>क्या आप जानते हैं?: ब्रिक्स अब केवल 5 देशों का समूह नहीं रहा, बल्कि इसमें अब 11 पूर्ण सदस्य और 10 भागीदार देश शामिल हो चुके हैं, जो इसे दुनिया के एक बड़े भू-भाग का प्रतिनिधित्व करने वाला संगठन बनाता है।

Frequently Asked Questions

प्रश्न 1: ब्रिक्स शिखर सम्मेलन 2026 की मेजबानी कौन कर रहा है?
उत्तर: इस वर्ष 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेजबानी भारत कर रहा है और यह नई दिल्ली में आयोजित होगा।

प्रश्न 2: 'ऑपरेशन इकोनॉमिक आउटकास्ट' क्या है?
उत्तर: यह अमेरिका द्वारा ईरान को आर्थिक रूप से अलग-थलग करने की एक योजना है, जिससे ईरान के वैश्विक व्यापारिक संबंध प्रभावित हो सकते हैं।