जम्मू की एक अदालत ने 2019 के पुलवामा हमले के बाद पाकिस्तान के खिलाफ विरोध प्रदर्शन के दौरान दंगों में शामिल होने के आरोप में बुक किए गए सात व्यक्तियों को बरी कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल भीड़ का हिस्सा होना किसी व्यक्ति को अपराध का दोषी नहीं बनाता।
- जम्मू की अदालत ने 7 आरोपियों को दंगों और आगजनी के आरोपों से मुक्त किया।
- कोर्ट ने कहा कि केवल सेल फोन टावर लोकेशन से किसी को 'गैरकानूनी सभा' का हिस्सा नहीं माना जा सकता।
- न्यायाधीश ने स्पष्ट किया कि अदालत अभियोजन पक्ष के कहने पर चार्ज फ्रेम करने वाली 'पोस्ट ऑफिस' नहीं है।
जम्मू की एक अदालत ने एक महत्वपूर्ण कानूनी मिसाल कायम करते हुए सात पुरुषों को राहत प्रदान की है, जिन पर 2019 के पुलवामा आतंकी हमले के बाद पाकिस्तान के खिलाफ किए गए विरोध प्रदर्शन के दौरान दंगा करने और आगजनी करने का आरोप था। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि किसी व्यक्ति को भीड़ द्वारा किए गए अपराध से तब तक नहीं जोड़ा जा सकता, जब तक कि इस बात के पुख्ता सबूत न हों कि उस व्यक्ति का भीड़ के अन्य सदस्यों के साथ 'समान गैरकानूनी उद्देश्य' था।
अदालत द्वारा बरी किए गए व्यक्तियों में रोहित शर्मा, कैलाश कुमार, मनत कुमार, साजन कुमार, सुखदेव सिंह उर्फ रिंकू, साहिल शर्मा और जगदीश कुमार शामिल हैं। पुलिस की प्राथमिकी (FIR) के अनुसार, लगभग 600-700 लोगों की भीड़ ने शहर में जुलूस निकाला था। आरोप था कि पुलिस द्वारा रोके जाने पर भीड़ हिंसक हो गई और सड़क किनारे खड़ी छह गाड़ियों में आग लगा दी।
Why This Matters
BozokMedia analysis shows कि यह फैसला व्यक्तिगत जवाबदेही और सामूहिक जिम्मेदारी के बीच के अंतर को स्पष्ट करता है। अक्सर जांच एजेंसियां केवल उपस्थिति (Presence) को अपराध (Commission) मान लेती हैं। यह फैसला स्पष्ट करता है कि लोकतांत्रिक विरोध और अचानक भड़की हिंसा के बीच एक बारीक रेखा होती है, और बिना विशिष्ट साक्ष्यों के किसी नागरिक को अपराधी नहीं ठहराया जा सकता।
द्वितीय अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश अनूप कुमार शर्मा ने पुलिस चालान को खारिज करते हुए कहा कि जांच एजेंसी ने केवल गवाहों के बयानों और सेल फोन टावर लोकेशन के आधार पर पहचान स्थापित करने की कोशिश की, जो पर्याप्त नहीं है।
"अदालत अभियोजन पक्ष के कहने पर आरोप तय करने के लिए महज एक डाकघर (Post Office) के रूप में कार्य नहीं करती, बल्कि उसे मामले के तथ्यों पर अपना न्यायिक दिमाग लगाना होता है।"
अदालत ने यह भी पाया कि धारा 144 के उल्लंघन का कोई ठोस सबूत पेश नहीं किया गया। न्यायाधीश ने सवाल उठाया कि जब रिकॉर्ड पर कोई निषेधात्मक आदेश ही नहीं है, तो उसके उल्लंघन का आरोप कैसे लगाया जा सकता है? साथ ही, यह भी नोट किया गया कि भीड़ का शुरुआती उद्देश्य गैरकानूनी नहीं था, बल्कि वह शहीद जवानों के प्रति सम्मान और दुश्मन देश के खिलाफ विरोध था।
Frequently Asked Questions
1. कोर्ट ने आरोपियों को बरी क्यों किया?
क्योंकि पुलिस यह साबित करने में विफल रही कि आरोपियों का भीड़ के साथ कोई 'समान गैरकानूनी उद्देश्य' था या उन्होंने सीधे तौर पर आगजनी में भाग लिया था।
2. क्या सेल फोन टावर लोकेशन किसी को दोषी ठहराने के लिए काफी है?
नहीं, अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल टावर लोकेशन यह साबित नहीं करती कि व्यक्ति उस विशिष्ट हिंसक कृत्य का हिस्सा था।