मणिपुर में अवैध प्रवासन को रोकने के लिए राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) के लिए 1951 के आधार वर्ष की मांग की जा रही है। यह मुद्दा मैतेई-नागा समूहों और कुकी-ज़ो समुदायों के बीच राजनीतिक प्रतिनिधित्व और जनसांख्यिकीय पहचान की जंग बन गया है।
- मणिपुर के गृह मंत्री गोविंदस कोंथौजम ने NRC के लिए 1951 को आधार वर्ष बनाने का प्रस्ताव दिया है।
- यह मांग नवंबर 1950 में राज्य की परमिट प्रणाली के समाप्त होने से जुड़ी है।
- मैतेई और नागा संगठन चाहते हैं कि 2027 की जनगणना से पहले NRC पूरा हो ताकि परिसीमन प्रभावित न हो।
- कुकी-ज़ो समुदाय ने इस आधार का विरोध किया है, क्योंकि 1951 में पहाड़ी क्षेत्रों में रिकॉर्ड की कमी थी।
मणिपुर राज्य एक जटिल कानूनी और राजनीतिक संघर्ष के दौर से गुजर रहा है। राज्य सरकार ने संकेत दिया है कि वह राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) के लिए 1951 को कट-ऑफ तिथि के रूप में उपयोग करना चाहती है। गृह मंत्री गोविंदस कोंथौजम द्वारा घोषित इस कदम का उद्देश्य 'गैर-मणिपुरियों' की पहचान करना और उनकी उपस्थिति को विनियमित करना है।
1951 के ऐतिहासिक तर्क
1951 के वर्ष का चयन यादृच्छिक नहीं है। ऐतिहासिक रूप से, मणिपुर की रियासत में बाहरी लोगों के प्रवेश को नियंत्रित करने के लिए एक सख्त परमिट प्रणाली लागू थी, जिसे 18 नवंबर, 1950 को समाप्त कर दिया गया था। इसके बाद, 1951 की जनगणना—जो आजादी के बाद की पहली जनगणना थी—राज्य की जनसांख्यिकीय स्थिति का पहला व्यापक दस्तावेज़ बनी। समर्थकों का तर्क है कि परमिट प्रणाली हटने के बाद जनसंख्या में जो वृद्धि हुई (जैसे 1951 में 12.80% से 1961 में 35.04%), वह अवैध प्रवासन का प्रमाण है।
यह क्यों महत्वपूर्ण है?
BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि यह केवल नागरिकता का मामला नहीं है, बल्कि राजनीतिक अस्तित्व की लड़ाई है। मैतेई और नागा संगठन चाहते हैं कि 2027 की जनगणना से पहले NRC पूरा हो जाए। इसका मुख्य कारण यह है कि यदि अवैध प्रवासियों को जनगणना में गिना गया, तो आगामी परिसीमन (constituency delimitation) के दौरान राजनीतिक प्रतिनिधित्व और सीटों का बंटवारा बदल सकता है, जिससे स्थानीय समुदायों का प्रभाव कम हो सकता है।
1951 की बेसलाइन एक रणनीतिक प्रयास है ताकि जनसांख्यिकीय घड़ी को प्रवासन-पूर्व युग में वापस ले जाया जा सके और ऐतिहासिक रिकॉर्ड्स को आधुनिक राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल किया जा सके।
मणिपुर बनाम असम: दो अलग आधार
अक्सर मणिपुर की इस मांग की तुलना असम NRC से की जाती है, जहाँ 24 मार्च, 1971 को कट-ऑफ माना गया था। हालांकि, दोनों की स्थितियाँ अलग हैं। असम की तिथि असम समझौते का परिणाम थी, जो बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के भू-राजनीतिक संकट से प्रेरित थी। मणिपुर के समर्थकों का कहना है कि उनकी समस्या स्थानीय परमिट प्रणाली के उन्मूलन से जुड़ी है, इसलिए उन्हें अधिक पुराने आधार की आवश्यकता है।
| विशेषता | असम NRC | प्रस्तावित मणिपुर NRC |
|---|---|---|
| कट-ऑफ तिथि | 24 मार्च, 1971 | 1951 |
| मुख्य कारण | असम समझौता / बांग्लादेश संकट | परमिट प्रणाली का अंत (1950) |
| मुख्य उद्देश्य | पूर्वी पाकिस्तान से प्रवासियों की पहचान | प्रवासन-पूर्व जनसांख्यिकीय आधार तय करना |
कुकी-ज़ो समुदायों का विरोध
कुकी-ज़ो काउंसिल ने इस मांग का कड़ा विरोध किया है। उनका तर्क है कि 1951 में मणिपुर के अधिकांश पहाड़ी क्षेत्र अत्यंत दुर्गम थे और वहां सड़क संपर्क नहीं था, जिससे उस समय की जनगणना अधूरी रही होगी। इसके अलावा, कुकी, ज़ोमी और चिन समुदाय ऐतिहासिक रूप से भारत-म्यांमार सीमा के दोनों ओर रहते आए हैं। ऐसे में 75 साल पुराने दस्तावेजों की मांग उन स्वदेशी लोगों को हाशिए पर धकेल सकती है जिनके पास उस समय के कागजात नहीं हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1: इस विवाद में 2027 की जनगणना क्यों महत्वपूर्ण है?
उत्तर 1: जनगणना के आंकड़ों के आधार पर ही निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन होता है। यदि NRC पहले नहीं हुआ, तो अवैध प्रवासी भी गिने जाएंगे, जिससे राजनीतिक सीटों का वितरण बदल सकता है।
प्रश्न 2: क्या मणिपुर सरकार स्वतंत्र रूप से NRC लागू कर सकती है?
उत्तर 2: नहीं, NRC लागू करने के लिए राज्य सरकार को केंद्र सरकार की मंजूरी और समन्वय की आवश्यकता होती है।