पंजाब सरकार ने जस्टिस अश्विनी कुमार मिश्रा की नियुक्ति पर आपत्ति जताते हुए केंद्र को पत्र लिखा है। जानिए संविधान और कॉलेजियम प्रणाली के तहत राज्य की वास्तविक शक्तियों के बारे में।
- पंजाब सरकार ने जस्टिस अश्विनी कुमार मिश्रा की नियुक्ति का विरोध किया है।
- संविधान के अनुच्छेद 217 के तहत राष्ट्रपति नियुक्ति करते हैं, जिसमें राज्यपाल से परामर्श लिया जाता है।
- 'परामर्श' का अर्थ 'सहमति' नहीं है, इसलिए राज्य सरकार के पास वीटो पावर नहीं है।
- सुप्रीम कोर्ट ने NJAC को रद्द कर कॉलेजियम प्रणाली को बरकरार रखा है।
हाल ही में पंजाब सरकार और केंद्र सरकार के बीच पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के नए मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति को लेकर एक बड़ा संवैधानिक विवाद खड़ा हो गया है। पंजाब कैबिनेट ने एक प्रस्ताव पारित कर केंद्र द्वारा जस्टिस अश्विनी कुमार मिश्रा की नियुक्ति पर कड़ा विरोध दर्ज किया है। मुख्यमंत्री भगवंत मान ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर इस प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं।
संवैधानिक प्रावधान और राज्य की भूमिका
इस विवाद के केंद्र में एक महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न है: क्या किसी राज्य की सरकार हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति को रोक सकती है? भारतीय संविधान के अनुच्छेद 217 के अनुसार, उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है। इस प्रक्रिया में भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) और संबंधित राज्य के राज्यपाल के साथ 'परामर्श' किया जाता है।
यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है कि संविधान 'परामर्श' (Consultation) शब्द का उपयोग करता है, न कि 'सहमति' (Consent) का। इसका अर्थ यह है कि हालांकि राज्य सरकार के विचारों को राज्यपाल के माध्यम से प्रक्रिया का हिस्सा बनाया जाता है, लेकिन राज्य के पास इस नियुक्ति को वीटो करने या रोकने का कानूनी अधिकार नहीं है।
Why This Matters
BozokMedia analysis shows कि यह विवाद केवल एक व्यक्ति की नियुक्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह केंद्र-राज्य संबंधों और न्यायपालिका की स्वतंत्रता के बीच के नाजुक संतुलन को दर्शाता है। जब कोई राज्य सरकार नियुक्ति को चुनौती देती है, तो यह संवैधानिक मर्यादाओं और संघीय ढांचे के बीच एक टकराव पैदा करता है।
न्यायपालिका की स्वतंत्रता बनाए रखने के लिए कॉलेजियम प्रणाली को सशक्त रखा गया है, ताकि कार्यपालिका का हस्तक्षेप न्यूनतम हो सके।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: न्यायिक नियुक्तियों का इतिहास संघर्षों से भरा रहा है। 1981 के 'फर्स्ट जजेस केस' में कार्यपालिका का पलड़ा भारी था, लेकिन 1993 के 'सेकंड जजेस केस' ने कॉलेजियम प्रणाली की नींव रखी, जिसने नियुक्तियों में न्यायपालिका को प्रधानता दी।
2014 में संसद ने NJAC (राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग) के माध्यम से इस प्रणाली को बदलने की कोशिश की थी, लेकिन 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने इसे असंवैधानिक घोषित कर दिया। अदालत का तर्क था कि कार्यपालिका को अधिक शक्ति देना न्यायपालिका की स्वतंत्रता के लिए खतरा है, जो संविधान के 'मूल ढांचे' का हिस्सा है।
Frequently Asked Questions
प्रश्न 1: क्या मुख्यमंत्री मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति रोक सकता है?
उत्तर: नहीं, मुख्यमंत्री की भूमिका केवल परामर्श देने तक सीमित है; अंतिम निर्णय राष्ट्रपति का होता है।
प्रश्न 2: कॉलेजियम प्रणाली क्या है?
उत्तर: यह न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए वरिष्ठ न्यायाधीशों का एक समूह है जो नियुक्तियों की सिफारिश करता है।