गड़चिरोली के स्थानीय आदिवासी समूहों ने गोंडवाना विश्वविद्यालय द्वारा एक कुख्यात पूर्व माओवादी नेता की नियुक्ति का विरोध किया है। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि आदिवासियों का शोषण करने वाले व्यक्ति को उनके सशक्तिकरण की जिम्मेदारी देना अन्यायपूर्ण है।
- गोंडवाना विश्वविद्यालय ने पूर्व माओवादी नेता भूपति (alias सोनू) को कोऑर्डिनेटर नियुक्त किया।
- स्थानीय आदिवासी समूहों और महाग्रामसभा ने इस नियुक्ति को रद्द करने की मांग की है।
- विवाद का मुख्य कारण PESA एक्ट और वन अधिकार अधिनियम के तहत आदिवासियों को जागरूक करने की जिम्मेदारी देना है।
महाराष्ट्र के गड़चिरोली जिले में उस समय तनाव फैल गया जब गोंडवाना विश्वविद्यालय ने एक कुख्यात पूर्व माओवादी नेता, जिसे भूपति, अभय या मल्लोजुला वेणुगोपाल के नाम से जाना जाता है, को 'विलेज काउंसिल कैपेसिटी बिल्डिंग एंड ट्रेनिंग सेंटर' में कोऑर्डिनेटर नियुक्त किया। इस निर्णय ने स्थानीय आदिवासी समुदायों के बीच भारी नाराजगी पैदा कर दी है, जिन्होंने विश्वविद्यालय प्रशासन और जिला प्रशासन के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।
महाग्रामसभा के नेता बजीराव उसेंडी ने इस नियुक्ति पर गंभीर सवाल उठाते हुए कहा कि जिस व्यक्ति ने बाहरी होकर आदिवासियों का शोषण किया और उन्हें मौत के मुंह में धकेला, उसे अब आदिवासियों के सशक्तिकरण की जिम्मेदारी कैसे सौंपी जा सकती है। उन्होंने तर्क दिया कि PESA (पंचायत विस्तार अनुसूचित क्षेत्र) अधिनियम के लिए काम करने वाले योग्य स्थानीय आदिवासियों को दरकिनार कर एक बाहरी व्यक्ति को प्राथमिकता देना समझ से परे है।
Why This Matters
BozokMedia analysis shows that this controversy highlights a deeper conflict between state-led rehabilitation policies for surrendered insurgents and the grassroots trauma of the victimized local populations. While the government views the surrender of leaders like Bhupati as a strategic victory against Maoism, the local tribal population views it as an insult to those who suffered under Naxal terror and those still languishing in jails for forced cooperation.
The appointment of a former insurgent to a role involving community trust is a high-risk administrative gamble that often overlooks the psychological scars of the marginalized.
विश्वविद्यालय के कुलपति प्रशांत बोकारे ने स्पष्ट किया कि यह नियुक्ति केवल तीन महीने के लिए है और भूपति की भूमिका केवल लिपिकीय (clerical) होगी। उन्होंने दावा किया कि उन्हें ग्रामसभाओं का मार्गदर्शन करने या प्रशिक्षण देने की कोई जिम्मेदारी नहीं दी जाएगी। हालांकि, विश्वविद्यालय द्वारा 29 अगस्त को जारी अधिसूचना में स्पष्ट रूप से उल्लेख था कि परियोजना समन्वयक की नियुक्ति 'एकीकृत ग्राम सभा प्रशिक्षण कार्यक्रम' के लिए की गई है, जिससे प्रशासन के दावों पर विरोधाभास पैदा हो गया है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: गड़चिरोली क्षेत्र दशकों से माओवादी हिंसा और राज्य सुरक्षा बलों के बीच संघर्ष का केंद्र रहा है। PESA अधिनियम, 1996 का उद्देश्य पांचवीं अनुसूची वाले क्षेत्रों में आदिवासियों को स्वशासन का अधिकार देना था, लेकिन जमीनी स्तर पर इसका कार्यान्वयन अक्सर राजनीतिक और सुरक्षा चुनौतियों के कारण बाधित रहा है।
दावे बनाम वास्तविकता
| विश्वविद्यालय का दावा | आदिवासियों का आरोप |
|---|---|
| भूमिका केवल लिपिकीय (Clerical) है। | नियुक्ति पत्र में 'प्रशिक्षण कार्यक्रम' का उल्लेख है। |
| नियुक्ति उचित प्रक्रिया के बाद हुई। | योग्य स्थानीय आदिवासियों की अनदेखी की गई। |
| यह एक अस्थायी 3 महीने की नियुक्ति है। | यह विश्वासघात और आदिवासी हितों के खिलाफ है। |
Frequently Asked Questions
1. PESA अधिनियम क्या है?
यह 1996 का एक कानून है जो आदिवासी क्षेत्रों में ग्राम सभाओं को सशक्त बनाता है ताकि वे अपने संसाधनों और शासन पर नियंत्रण रख सकें।
2. आदिवासियों के विरोध का मुख्य कारण क्या है?
उनका विरोध इस बात पर है कि एक पूर्व माओवादी, जिसने क्षेत्र में हिंसा फैलाई, उसे अब आदिवासियों को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करने की जिम्मेदारी दी गई है।