मद्रास उच्च न्यायालय की मदुरै पीठ ने जनगणना 2027 के प्रश्नावली में दिव्यांगता संबंधी डेटा शामिल करने की मांग करने वाली एक जनहित याचिका पर केंद्र और राज्य सरकार को नोटिस जारी किया है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि डेटा के अभाव में दिव्यांगजन सरकारी योजनाओं से वंचित रह जाएंगे।

  • मद्रास उच्च न्यायालय ने जनगणना 2027 में दिव्यांगता डेटा शामिल करने के लिए नोटिस जारी किया।
  • याचिकाकर्ता के अनुसार, 2001 और 2011 की जनगणना में यह डेटा एकत्र किया गया था, लेकिन वर्तमान योजना में इसे नजरअंदाज किया गया है।
  • डेटा की कमी से शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसी कल्याणकारी नीतियों के कार्यान्वयन में बाधा आने की आशंका है।

मदुरै: मद्रास उच्च न्यायालय की मदुरै पीठ ने मंगलवार को एक महत्वपूर्ण जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करते हुए केंद्र और राज्य सरकारों को नोटिस जारी किया है। इस याचिका में मांग की गई है कि आगामी जनगणना 2027 की प्रश्नावली में दिव्यांगता से संबंधित विवरणों को अनिवार्य रूप से शामिल किया जाए।

जस्टिस सी.वी. कार्तिकेयन और जस्टिस आर. सक्तिवेल की खंडपीठ ने तंजावुर जिले के कुंभकोणम निवासी स्वामीमलई सुंदर विमलनाथन द्वारा दायर याचिका पर यह आदेश दिया। याचिकाकर्ता ने अदालत का ध्यान इस ओर आकर्षित किया कि वर्ष 2001 और 2011 की जनसंख्या गणना के दौरान, परिवारों से दिव्यांगता संबंधी विशिष्ट जानकारी एकत्र की गई थी, जो नीति निर्धारण के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण थी।

याचिका में तर्क दिया गया है कि जनगणना 2027 की वर्तमान प्रक्रिया में दिव्यांगता संबंधी विवरणों का अभाव है। यह चूक न केवल मनमानी है, बल्कि समानता और सामाजिक न्याय के संवैधानिक सिद्धांतों के भी विपरीत है। याचिकाकर्ता का दावा है कि यदि व्यापक डेटा एकत्र नहीं किया गया, तो सरकार के पास दिव्यांगजनों के लिए कल्याणकारी नीतियां बनाने और योजनाओं को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए कोई विश्वसनीय सांख्यिकीय आधार नहीं होगा।

Why This Matters

BozokMedia analysis shows that statistical invisibility is the biggest hurdle for marginalized communities. Without granular data from the census, the Rights of Persons with Disabilities Act, 2016 remains a paper tiger, as resource allocation depends entirely on documented population figures. The lack of data directly translates to underfunded accessibility projects and inadequate social security.

"Data is the foundation of governance; when a community is missing from the census, they are effectively erased from the national budget and policy priorities."

याचिकाकर्ता ने आगे कहा कि दिव्यांगजन समाज के सबसे कमजोर वर्गों में से एक हैं। शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य देखभाल, पुनर्वास, सुगम्यता, आरक्षण और वित्तीय सहायता जैसे क्षेत्रों में योजना बनाने के लिए सटीक आंकड़ों की आवश्यकता होती है। आंकड़ों के अभाव में, देश भर के दिव्यांगजन 'सांख्यिकीय रूप से अदृश्य' (statistically invisible) हो जाएंगे, जिससे उन्हें उनके वैधानिक लाभों से वंचित रहना पड़ेगा।

क्या आप जानते हैं?: भारत में 'दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम 2016' दिव्यांग व्यक्तियों को समाज में पूर्ण भागीदारी और समानता का अधिकार देता है, लेकिन इसके प्रभावी क्रियान्वयन के लिए सटीक जनसंख्या डेटा अनिवार्य है।

Frequently Asked Questions

प्रश्न 1: याचिकाकर्ता ने किन पिछली जनगणनाओं का संदर्भ दिया?
उत्तर: याचिकाकर्ता ने 2001 और 2011 की जनगणना का उल्लेख किया, जिनमें दिव्यांगता संबंधी डेटा एकत्र किया गया था।

प्रश्न 2: अदालत ने अगली सुनवाई कब तय की है?
उत्तर: अदालत ने इस मामले की अगली सुनवाई 5 अक्टूबर के लिए निर्धारित की है।