पुणे में शोर-मुक्त गणेशोत्सव की मांग पर मंडलों ने मिश्रित प्रतिक्रिया दी है। जहां कुछ मंडल नियमों का समर्थन कर रहे हैं, वहीं अन्य का तर्क है कि सीमित समय के लिए ध्वनि प्रणालियों का उपयोग आवश्यक है।
- पुणे में कार्यकर्ताओं ने त्योहारों के दौरान DJ और ढोल-ताशा के शोर पर पूर्ण प्रतिबंध की मांग की है।
- अधिकांश मंडल पुलिस द्वारा निर्धारित '4 बेस और 4 टॉप' स्पीकर की सीमा का समर्थन करते हैं, लेकिन पूर्ण प्रतिबंध के खिलाफ हैं।
- मंडलों का तर्क है कि ढोल-ताशा पथकों की कमी के कारण साउंड सिस्टम एक मजबूरी है।
- विशेषज्ञों का मानना है कि शहरी क्षेत्रों में 'एम्बिएंट नॉइज़' (परिवेशी शोर) के कारण ध्वनि सीमा का उल्लंघन आसानी से हो जाता है।
पुणे का गणेशोत्सव अपनी भव्यता और सांस्कृतिक विरासत के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध है। हालांकि, हाल ही में कार्यकर्ता विद्यानंद बापट के नेतृत्व में एक नागरिक अभियान शुरू हुआ है, जिसमें मांग की गई है कि शहर की सड़कों पर शोर की सीमा का उल्लंघन करने वाले DJ और ढोल-ताशा पथकों को पूरी तरह प्रतिबंधित किया जाए। इस मांग ने शहर के गणेश मंडलों के बीच एक नई बहस छेड़ दी है।
शिवाजीनगर के श्री गुरुदत्त मित्र मंडल के अध्यक्ष उदय महाले ने स्पष्ट किया कि पुणे में उत्सव का पैमाना इतना बड़ा है कि हर मंडल के लिए पारंपरिक ढोल-ताशा पथक उपलब्ध कराना असंभव है। उन्होंने तर्क दिया कि हजारों विसर्जन जुलूसों के मुकाबले पथकों की संख्या बहुत कम है, इसलिए साउंड सिस्टम का उपयोग एक व्यावहारिक आवश्यकता बन जाता है।
Why This Matters
BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि यह विवाद केवल शोर के बारे में नहीं है, बल्कि यह शहरी नियोजन और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति के बीच के संघर्ष को दर्शाता है। जब पारंपरिक संसाधनों (जैसे ढोल-ताशा पथक) की मांग आपूर्ति से अधिक हो जाती है, तो समुदाय तकनीकी विकल्पों की ओर मुड़ते हैं, जो अक्सर पर्यावरण और स्वास्थ्य नियमों के साथ टकराते हैं।
वहीं, पार्वती के शिव दर्शन मित्र मंडल के अध्यक्ष और भाजपा महासचिव गणेश घोष खंडाळकर ने कहा कि मंडल हमेशा सरकारी नियमों का सम्मान करते रहे हैं। उन्होंने सुझाव दिया कि यदि कोई नियमों में बुनियादी बदलाव चाहता है, तो उसे सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाना चाहिए, न कि उत्सव के माहौल को प्रभावित करना चाहिए।
“शहरी क्षेत्रों में ट्रैफिक और हॉर्न के कारण बेस नॉइज़ पहले से ही 93-112 डेसिबल तक होता है, जिससे किसी भी लाउडस्पीकर का उपयोग तुरंत सीमा पार कर देता है।”
ध्वनि प्रणाली व्यवसायी आकाश सेठी ने एक तकनीकी समाधान प्रस्तावित किया है। उनका कहना है कि पुलिस को केवल स्रोत (स्पीकर) पर शोर नहीं मापना चाहिए, बल्कि शिकायतकर्ता के स्थान पर परिवेशी शोर की भी जांच करनी चाहिए।
गोखले इंस्टीट्यूट ऑफ पॉलिटिक्स एंड इकोनॉमिक्स के छात्रों द्वारा किए गए एक सर्वेक्षण में दिलचस्प तथ्य सामने आए। सर्वेक्षण के अनुसार, पुणे के पुराने 'पेठ' क्षेत्रों के मंडल अभी भी पारंपरिक ढोल-ताशा को प्राथमिकता देते हैं, जबकि कोथरुड और शिवाजीनगर जैसे नए इलाकों में साउंड सिस्टम का चलन अधिक है।
| क्षेत्र (Area) | पसंदीदा संगीत (Preferred Music) | वास्तविक उपयोग (Actual Usage) |
|---|---|---|
| पेठ क्षेत्र (Peth Areas) | ढोल-ताशा | उच्च (High) |
| कोथरुड/शिवाजीनगर | ढोल-ताशा | कम (साउंड सिस्टम का अधिक उपयोग) |
Frequently Asked Questions
1. पुणे पुलिस ने साउंड सिस्टम के लिए क्या नियम बनाए हैं?
पुलिस ने वर्तमान में अधिकतम चार बेस और चार टॉप स्पीकर के उपयोग की अनुमति दी है।
2. मंडलों का मुख्य विरोध किस बात पर है?
मंडलों का विरोध साउंड सिस्टम और ढोल-ताशा पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की मांग के खिलाफ है।