रौज़ एवेन्यू कोर्ट ने दिल्ली जल बोर्ड के पूर्व सीईओ सहित पांच आरोपियों को एसटीपी टेंडर घोटाले में जमानत दे दी है। अदालत ने गिरफ्तारियों की समय-सीमा और जांच प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए हैं।
- रौज़ एवेन्यू कोर्ट ने पूर्व डीजेबी सीईओ उदित प्रकाश राय सहित 5 आरोपियों को नियमित जमानत दी।
- अदालत ने भ्रष्टाचार के आरोपों के लिए बैंकिंग चैनलों के उपयोग पर आश्चर्य जताया।
- जांच में 27 महीने की देरी और गिरफ्तारी के आधारों को 'संदिग्ध' बताया गया।
नई दिल्ली की एक विशेष अदालत ने बुधवार को कथित करोड़ों रुपये के सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) टेंडर घोटाले में भ्रष्टाचार निरोधक शाखा (ACB) द्वारा गिरफ्तार पांच आरोपियों को नियमित जमानत दे दी। यह फैसला आम आदमी पार्टी के नेता सत्येंद्र जैन को पिछले हफ्ते मिली जमानत के बाद आया है, जिससे इस मामले में बचाव पक्ष को बड़ी राहत मिली है।
जमानत पाने वालों में दिल्ली जल बोर्ड (DJB) के पूर्व सीईओ उदित प्रकाश राय, पूर्व सलाहकार अंकित श्रीवास्तव, एएन एंटरप्राइजेज के प्रोपराइटर नगेंद्र यादव, यूरोटेक एनवायरनमेंट के मालिक राज कुमार कुर्रा और सृजनहर के प्रोपराइटर पंकज वर्मा शामिल हैं। इन सभी को 18 अगस्त को गिरफ्तार किया गया था।
जांच प्रक्रिया पर कोर्ट की कड़ी टिप्पणी
विशेष न्यायाधीश डिग विनय सिंह ने अपने आदेश में पूर्व सीईओ उदित प्रकाश राय की गिरफ्तारी की परिस्थितियों पर सवाल उठाए। कोर्ट ने कहा कि राय, जो मिजोरम में सरकारी सेवा में तैनात थे, से यह उम्मीद नहीं की जा सकती थी कि वे इतनी कम सूचना पर दिल्ली आएं। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि उन्होंने जांच में शामिल होने के लिए 10 दिन का समय मांगा, तो इसे 'असहयोग' कहना अनुचित है।
अदालत ने इस बात पर भी आश्चर्य जताया कि यदि यह पैसा रिश्वत (kickback) था, तो वह बैंकिंग चैनलों के माध्यम से क्यों भेजा गया? न्यायाधीश ने तर्क दिया कि कोई भी व्यक्ति रिश्वत लेने के लिए पारदर्शी बैंकिंग माध्यमों का उपयोग नहीं करेगा, और यदि वह राशि रिश्वत थी, तो उसे ब्याज सहित वापस क्यों किया गया?
Why This Matters
BozokMedia विश्लेषण दर्शाता है कि यह मामला केवल प्रशासनिक भ्रष्टाचार का नहीं, बल्कि जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाने वाला है। जब प्रवर्तन निदेशालय (ED) जैसी कड़ी एजेंसी ने मनी ट्रेल की जांच के बाद भी गिरफ्तारी को जरूरी नहीं समझा, तो ACB की अचानक की गई कार्रवाई कोर्ट की नजरों में संदिग्ध प्रतीत हुई। यह दर्शाता है कि कानूनी प्रक्रियाओं में 'तथ्यों' का वजन 'आरोपों' से अधिक होता है।
"सहयोग का अर्थ यह नहीं है कि आरोपी जांच अधिकारी की धुन पर नाचे और खुद को दोषी साबित करने वाले सबूतों की थाली पेश कर दे।"
बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि एफआईआर दर्ज होने के बाद गिरफ्तारियों में 27 महीने की अस्पष्ट देरी हुई। उन्होंने यह भी दावा किया कि इस दौरान जांच में कोई सार्थक प्रगति नहीं हुई और न ही साक्ष्यों के साथ छेड़छाड़ का कोई मामला सामने आया।
Frequently Asked Questions
1. इस मामले में मुख्य आरोप क्या हैं?
आरोप है कि सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) के टेंडरों के आवंटन में भ्रष्टाचार किया गया और इसमें करोड़ों रुपये की रिश्वत ली गई।
2. कोर्ट ने जमानत देने का मुख्य आधार क्या बनाया?
कोर्ट ने बैंकिंग चैनलों के माध्यम से लेनदेन, गिरफ्तारी में हुई देरी और प्रवर्तन निदेशालय द्वारा गिरफ्तारी न किए जाने को मुख्य आधार बनाया।