सुप्रीम कोर्ट ने पार्सवनाथ डेवलपर्स के एक साल में फ्लैट सौंपने या पैसा लौटाने के प्रस्ताव को खारिज कर दिया है। कोर्ट ने चेतावनी दी है कि यदि सभी आवंटियों के दावों का समाधान नहीं हुआ, तो एक उच्च-स्तरीय समिति (High-Powered Committee) नियुक्त की जाएगी।
- सुप्रीम कोर्ट ने एक वर्ष के भीतर घरों की डिलीवरी या रिफंड के पार्सवनाथ के प्रस्ताव को खारिज किया।
- अदालत ने समाधान की निगरानी के लिए उच्च-स्तरीय समिति नियुक्त करने की चेतावनी दी।
- मुख्य न्यायाधीश ने डेवलपर को सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री में ₹500 करोड़ जमा करने को कहा।
- हरियाणा रेरा (Haryana RERA) के आदेशों को लागू न करने पर कोर्ट ने नाराजगी जताई।
सैकड़ों घर खरीदारों के लिए एक बड़ी राहत और पार्सवनाथ डेवलपर्स के लिए बड़ा झटका आया है। सुप्रीम कोर्ट ने कंपनी के उस प्रस्ताव को सिरे से खारिज कर दिया है जिसमें एक साल के भीतर फ्लैट सौंपने या पैसा वापस करने की बात कही गई थी। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जोयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने इस प्रस्ताव को अनुपालन में देरी करने का "एक और तरीका" बताया।
यह मामला पार्सवनाथ के उन खरीदारों के लंबे संघर्ष को दर्शाता है जिन्होंने अपनी जीवन भर की जमा पूंजी निवेश की, लेकिन उन्हें आज तक घर नहीं मिला। पार्सवनाथ ग्रुप के पास 24 आवास परियोजनाएं हैं जिनमें लगभग 27,000 इकाइयां शामिल हैं। कोर्ट में दी गई जानकारी के अनुसार, इनमें से 24,000 इकाइयां बेची जा चुकी हैं, जबकि लगभग 3,000 का कब्जा अभी भी लंबित है।
यह क्यों महत्वपूर्ण है
BozokMedia के विश्लेषण के अनुसार, यह मामला रियल एस्टेट नियामक ढांचे की विफलता को उजागर करता है। जब एक डेवलपर हरियाणा रेरा जैसे अर्ध-न्यायिक निकाय के आदेशों की अनदेखी करता है, तो खरीदार कानूनी रूप से जीत कर भी वास्तव में हार जाता है। यह मामला इस बात की परीक्षा है कि क्या न्यायपालिका कॉर्पोरेट जवाबदेही को सख्ती से लागू कर सकती है।
कोर्ट ने विशेष रूप से रीता टीक्कु और लोकाइश टीक्कु के मामले का जिक्र किया, जिन्होंने गुरुग्राम के पार्सवनाथ एक्सोटिका प्रोजेक्ट में 1.78 करोड़ रुपये निवेश किए थे। 2013 में कब्जा मिलने होना था, लेकिन 2021 तक उन्हें न तो घर मिला और न ही उनका पैसा वापस आया।
रेरा आदेशों का कार्यान्वयन न होना यह दर्शाता है कि डेवलपर्स नियामक दंड को व्यवसाय की लागत मानते हैं, न कि घर देने की अनिवार्यता।
अदालत ने दिवाला प्रक्रिया (Insolvency Process) पर भी सवाल उठाए। जब दिवाला समाधान पेशेवर (IRP) ने फ्रीज किए गए बैंक खातों को संचालित करने की अनुमति मांगी, तो मुख्य न्यायाधीश ने सवाल किया कि यदि IRP अपना काम ठीक से कर रहे होते, तो घर खरीदारों को सुप्रीम कोर्ट नहीं आना पड़ता।
परियोजना स्थिति का विवरण
| विवरण | जानकारी |
|---|---|
| कुल परियोजनाएं | 24 आवास परियोजनाएं |
| कुल इकाइयां | ~27,000 |
| बेची गई इकाइयां | ~24,000 |
| लंबित कब्जा | ~3,000 |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1: यदि पार्सवनाथ नया प्रस्ताव देने में विफल रहता है तो क्या होगा?
सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया है कि वह एक उच्च-स्तरीय समिति नियुक्त करेगा जिसे सभी आवंटियों के दावों को हल करने की जिम्मेदारी सौंपी जाएगी।
प्रश्न 2: कोर्ट ने एक साल के कब्जे के वादे को क्यों खारिज किया?
अदालत का मानना था कि यह समय सीमा खरीदारों की शिकायतों को दूर करने के बजाय मामले को और खींचने की एक रणनीति थी।