आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय विशाखापट्टनम और अनाकापल्ली में गूगल के हाइपरस्केल डेटा सेंटर के लिए इको-सेंसिटिव ज़ोन में मंदिर की भूमि के आवंटन और पर्यावरणीय मंजूरी की जांच कर रहा है।
- AP हाई कोर्ट मंदिर की भूमि के 30 वर्ष बनाम 11 वर्ष के पट्टे (Lease) के परस्पर विरोधी दावों की जांच कर रहा है।
- यह परियोजना कंबलाकोंडा रिजर्व फॉरेस्ट के इको-सेंसिटिव ज़ोन (ESZ) से 1 किमी के दायरे में स्थित है।
- याचिका में पानी और बिजली की भारी खपत और डेटा स्थानीयकरण कानूनों पर चिंता जताई गई है।
आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय में बुधवार को विशाखापट्टनम और अनाकापल्ली जिलों में गूगल इंक (विजाग हाइपरस्केल डेटा सेंटर पार्क लिमिटेड के माध्यम से) द्वारा स्थापित किए जा रहे हाइपरस्केल डेटा सेंटर के भूमि आवंटन को लेकर तीखी बहस हुई। यह विवाद मुख्य रूप से इको-सेंसिटिव ज़ोन (ESZ) में स्थित सिम्हाचलम देवस्थानम की भूमि के आवंटन से जुड़ा है।
मुख्य न्यायाधीश लिसा गिल की अध्यक्षता वाली खंडपीठ के सामने पट्टे की अवधि को लेकर गंभीर मतभेद सामने आए। जहां एक दावा है कि भूमि 30 वर्षों के लिए लीज पर दी गई थी, वहीं दूसरा दावा है कि यह शुरू में केवल 11 वर्षों के लिए थी, जिसे AP औद्योगिक बुनियादी ढांचा निगम द्वारा बढ़ाया जा सकता था। अदालत ने दोनों पक्षों से विस्तृत विवरण मांगा है, क्योंकि राज्य के अचल संपत्ति कानूनों और लीज एंड लाइसेंस नियम, 2003 के तहत मंदिर की भूमि के उपयोग और अवधि पर सख्त प्रतिबंध हैं।
पर्यावरणीय चिंताएं इस कानूनी लड़ाई का मुख्य केंद्र हैं। जल बिरदारी के राष्ट्रीय संयोजक बोलिसेट्टी सत्यनारायण द्वारा दायर याचिका में तर्क दिया गया है कि कंबलाकोंडा रिजर्व फॉरेस्ट के इको-सेंसिटिव ज़ोन से एक किलोमीटर की दूरी पर स्थित होने के कारण, इस परियोजना को 'श्रेणी-ए' (Category-A) के कड़े मानदंडों का पालन करना चाहिए। आरोप है कि इसे जानबूझकर 'श्रेणी-बी' के रूप में पेश किया गया ताकि सख्त नियमों से बचा जा सके।
यह क्यों महत्वपूर्ण है
BozokMedia के विश्लेषण से पता चलता है कि यह मामला AI-संचालित डिजिटल बुनियादी ढांचे के विस्तार और पर्यावरणीय स्थिरता के बीच बढ़ते वैश्विक तनाव को दर्शाता है। डेटा सेंटर अपने कूलिंग सिस्टम के लिए भारी मात्रा में पानी और बिजली की खपत करते हैं, जो पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में स्थानीय संसाधनों पर दबाव डाल सकते हैं। इसके अलावा, विदेशी कॉर्पोरेट हितों के लिए धार्मिक बंदोबस्ती भूमि का उपयोग कानूनी और सामाजिक बहस को जन्म देता है।
डिजिटल संप्रभुता, पर्यावरण कानून और मंदिर ट्रस्ट की सुरक्षा का यह संगम भारत में औद्योगिक भूमि आवंटन के लिए एक ऐतिहासिक मामला बन सकता है।
महाधिवक्ता दम्मलपति श्रीनिवास ने तर्क दिया कि यह जनहित याचिका (PIL) विचारणीय नहीं है क्योंकि इसमें भूमि आवंटन और पर्यावरणीय मंजूरी जैसे दो अलग-अलग मुद्दों को मिला दिया गया है। उन्होंने सुझाव दिया कि यह मामला नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) के अधिकार क्षेत्र में आता है, जहां पहले से ही तीन मामले लंबित हैं।
भूमि और पर्यावरण के अलावा, याचिकाकर्ता के वकील विराग गुप्ता ने डेटा स्थानीयकरण (Data Localisation) के मुद्दे को उठाया। उन्होंने उल्लेख किया कि अमेरिका में भी ऊर्जा और पर्यावरणीय प्रभावों के कारण इसी तरह की डेटा सेंटर परियोजनाओं पर रोक लगाई गई है।
| विशेषता | याचिकाकर्ता का दावा | सरकार/कंपनी का पक्ष |
|---|---|---|
| पट्टे की अवधि | अधिकतम 11 वर्ष (राज्य कानून अनुसार) | संभावित 30 वर्ष / विस्तार योग्य |
| पर्यावरण श्रेणी | श्रेणी-A (सख्त अनुपालन) | श्रेणी-B (कम अनुपालन) |
| भूमि की स्थिति | पवित्र देवस्थानम/मंदिर की भूमि | औद्योगिक बुनियादी ढांचा आवंटन |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1: डेटा सेंटर का स्थान विवादास्पद क्यों है?
क्योंकि यह कंबलाकोंडा रिजर्व फॉरेस्ट के इको-सेंसिटिव ज़ोन के एक किलोमीटर के भीतर है, जिससे पारिस्थितिक क्षरण का डर है।
प्रश्न 2: लीज को लेकर कानूनी विवाद क्या है?
विवाद इस बात पर है कि क्या भूमि को 11 वर्षों (बंदोबस्ती कानूनों के अनुसार) या 30 वर्षों के लिए लीज पर दिया गया था, और क्या मंदिर की भूमि विदेशी कंपनी को देना कानूनी है।