गुवाहाटी उच्च न्यायालय ने कामरूप मेट्रोपॉलिटन में 650 परिवारों के विस्थापन के मामले में हस्तक्षेप करते हुए असम सरकार से मुआवजे और पुनर्वास की योजना मांगी है।
- गुवाहाटी उच्च न्यायालय ने 650 विस्थापित परिवारों के पुनर्वास पर सरकारी हलफनामा मांगा है।
- सितंबर 2024 में सोनापुर में 100 बीघा अधिसूचित जनजातीय भूमि को खाली कराने के लिए बेदखली अभियान चलाया गया था।
- इस अभियान के दौरान हिंसक झड़पों में दो लोगों की मौत हुई और 33 घायल हुए।
गुवाहाटी उच्च न्यायालय ने कामरूप मेट्रोपॉलिटन जिले के सोनापुर क्षेत्र में जबरन बेदखली के बाद उत्पन्न मानवीय संकट पर संज्ञान लिया है। न्यायमूर्ति देबाशीष बरुआ ने विभिन्न सरकारी विभागों को नोटिस जारी कर 76 याचिकाकर्ताओं द्वारा पुनर्वास और मुआवजे की मांग पर 6 अक्टूबर तक अपना आधिकारिक पक्ष रखने का निर्देश दिया है।
यह कानूनी विवाद 23 से 25 सितंबर 2024 के बीच चलाए गए एक बेदखली अभियान से जुड़ा है, जिसमें मुख्य रूप से प्रवासी बंगाली मुसलमानों के लगभग 650 परिवारों को 100 बीघा अधिसूचित जनजातीय भूमि से हटाया गया था। अदालत ने इस बात पर गौर किया है कि याचिकाकर्ता 'निजी पट्टा भूमि' (आधिकारिक तौर पर दर्ज संपत्ति) पर रह रहे थे, फिर भी उन्हें बिना किसी पुनर्वास के बेदखल कर दिया गया।
यह क्यों महत्वपूर्ण है
BozokMedia के विश्लेषण से पता चलता है कि यह मामला असम में भूमि अधिकारों, जनजातीय संरक्षण और प्रवासी पहचान के बीच के तनावपूर्ण संबंधों को उजागर करता है। पुनर्वास के लिए किसी पूर्व-निर्धारित ढांचे का अभाव अक्सर प्रशासनिक कार्रवाई को मानवाधिकारों के उल्लंघन में बदल देता है।
"भूमि மீட்பी अभियानों के दौरान तत्काल पुनर्वास प्रदान करने में विफलता अक्सर एक कानूनी प्रक्रिया को सांप्रदायिक और मानवीय आपदा में बदल देती है।"
बेदखली की समयरेखा एक गंभीर स्थिति को दर्शाती है। अभियान 9 सितंबर 2024 को शुरू हुआ था, लेकिन जब विस्थापित ग्रामीणों ने तीन दिन बाद जमीन पर फिर से कब्जा करने की कोशिश की, तो तनाव बढ़ गया। पुलिस फायरिंग में हैदर अली और जुबहीर अली नामक दो लोगों की मौत हो गई, जबकि पुलिस अधिकारियों सहित 33 अन्य घायल हुए।
अदालत ने अब सरकार को हलफनामा जमा करने के लिए 6 अक्टूबर की समय सीमा दी है। यह कदम असम सरकार को 'आश्रय के अधिकार' और जनजातीय भूमि से कब्जेदारों की बेदखली से संबंधित कानूनी प्रोटोकॉल के पालन के संबंध में न्यायिक जांच के दायरे में लाता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1: इस मामले में याचिकाकर्ता कौन हैं?
याचिकाकर्ता उन 650 विस्थापित परिवारों के प्रतिनिधि हैं, जिनमें मुख्य रूप से प्रवासी बंगाली मुस्लिम शामिल हैं, जिनका दावा है कि उनके पास जमीन के कानूनी पट्टा अधिकार थे।
अदालत की मुख्य चिंता यह है कि क्या सरकार ने उचित कानूनी प्रक्रिया का पालन किया और बेदखल किए गए लोगों को कोई पुनर्वास या मुआवजा क्यों नहीं दिया गया।