झारखंड उच्च न्यायालय ने सबूतों के अभाव में एक व्यक्ति की दुष्कर्म के प्रयास की सजा को संशोधित कर 'शील भंग' (Indecent Assault) में बदल दिया है। अदालत ने पाया कि मामला बलात्कार के प्रयास के बजाय महिला की गरिमा को ठेस पहुँचाने का था।

  • झारखंड हाईकोर्ट ने दुष्कर्म के प्रयास (IPC 376/511) की सजा को धारा 354 (शील भंग) में बदला।
  • अदालत ने माना कि बलात्कार के प्रयास के लिए पर्याप्त प्रत्यक्ष साक्ष्य मौजूद नहीं थे।
  • दोषी व्यक्ति को पहले से काटी गई 8 महीने की जेल की अवधि को ही अंतिम सजा माना गया।

रांची: झारखंड उच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक और कानूनी रूप से जटिल मामले में हस्तक्षेप करते हुए 26 साल पुराने दुष्कर्म के प्रयास के दोषसिद्धि आदेश को संशोधित किया है। जस्टिस प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की पीठ ने यह फैसला सुनाते हुए कहा कि मामले में ऐसे किसी विशिष्ट कार्य का प्रमाण नहीं मिला जो सीधे तौर पर दुष्कर्म के प्रयास की श्रेणी में आता हो।

यह पूरा मामला दिसंबर 1999 का है, जब एक महिला ने आरोप लगाया था कि कमलेंदु महतो ने जबरन उसके घर में प्रवेश किया और उसके साथ दुष्कर्म का प्रयास किया। पीड़िता के अनुसार, आरोपी ने उसके शरीर पर दबाव बनाया और उसकी साड़ी उठाकर उसे प्रताड़ित करने की कोशिश की। हालांकि, शोर मचाने पर पीड़िता की माँ वहां पहुँच गई और आरोपी मौके से फरार हो गया।

निचली अदालत (अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, घाटशिला) ने 2006 में महतो को दोषी पाते हुए चार साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी। इस फैसले को चुनौती देते हुए अपीलकर्ता ने तर्क दिया कि जांच अधिकारी का परीक्षण नहीं किया गया और प्राथमिकी (FIR) दर्ज करने में देरी हुई, जिससे मामले की विश्वसनीयता कम होती है।

Why This Matters

BozokMedia analysis shows that this judgment underscores the critical distinction between 'attempt to commit rape' and 'outraging the modesty of a woman' in Indian criminal jurisprudence. It highlights how the lack of 'proximate acts'—actions immediately leading to the crime—can lead to a downgrade in charges even after decades of litigation.

"The court's decision rests on the strict interpretation of evidence, ensuring that the punishment aligns precisely with the proven act rather than the perceived intent."

अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि गवाहों ने आरोपी को घर से भागते हुए देखा था, लेकिन घटना को केवल पीड़िता ने ही बयान किया। कोर्ट ने पाया कि FIR में दर्ज विवरण 'शील भंग' की ओर संकेत करते हैं, न कि बलात्कार के प्रयास की ओर। परिणामस्वरूप, अदालत ने धारा 376/511 के बजाय धारा 354 IPC के तहत दोषसिद्धि को बरकरार रखा और धारा 452 (घर में जबरन घुसना) के तहत सजा को कायम रखा।

26 साल की लंबी कानूनी लड़ाई और आरोपी द्वारा पहले ही 8 महीने की जेल काट लेने के कारण, कोर्ट ने उसे केवल उसी अवधि की सजा देने का निर्णय लिया।

क्या आप जानते हैं?: भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 354 विशेष रूप से महिलाओं की गरिमा को ठेस पहुँचाने के इरादे से किए गए हमले या आपराधिक बल के प्रयोग से संबंधित है।

Frequently Asked Questions

1. कोर्ट ने सजा को क्यों बदला?
क्योंकि सबूतों से यह साबित नहीं हुआ कि आरोपी ने बलात्कार करने के लिए कोई ऐसा ठोस कदम उठाया था जो सीधे तौर पर उस अपराध की ओर ले जाता हो।

2. आरोपी को अब कितनी सजा मिली?
अदालत ने उसे पहले से काटी गई 8 महीने की जेल की अवधि को ही पर्याप्त सजा माना।