बृहद मुंबई सार्वजनिक गणेशोत्सव समन्वय समिति ने उत्सव की पवित्रता बनाए रखने के लिए डीजे के उपयोग को अस्वीकार कर दिया है। समिति ने मंडलों को ध्वनि प्रदूषण नियमों का पालन करने और पारंपरिक भजनों को बढ़ावा देने का निर्देश दिया है।

  • दिन में 55 डेसिबल और रात में 45 डेसिबल की ध्वनि सीमा का पालन अनिवार्य।
  • समिति ने डीजे को 'अमान्य' घोषित कर पारंपरिक संगीत और भजनों के उपयोग का सुझाव दिया।
  • प्रतिमा की ऊंचाई तय करने के लिए विशेषज्ञों की समिति बनाने की मांग।
  • सुरक्षा के लिए सीसीटीवी और भक्तों के लिए मोबाइल शौचालय जैसी सुविधाओं पर जोर।

मुंबई और पूरे महाराष्ट्र में गणेशोत्सव की तैयारियों के बीच, बृहद मुंबई सार्वजनिक गणेशोत्सव समन्वय समिति ने एक महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश जारी किया है। समिति ने शहर के सभी गणेश मंडलों से अपील की है कि वे उत्सव के दौरान ध्वनि प्रदूषण को नियंत्रित करें और कानूनी सीमाओं का सख्ती से पालन करें। समिति के अनुसार, दिन के समय ध्वनि की सीमा 55 डेसिबल और रात के समय 45 डेसिबल निर्धारित की गई है।

समिति के अध्यक्ष नरेश दहिबाल्करे ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि समिति डीजे के उपयोग को स्वीकार नहीं करती है। उन्होंने तर्क दिया कि डीजे का शोर उत्सव की आध्यात्मिक शांति और पवित्रता को नष्ट करता है। उन्होंने मंडलों को सुझाव दिया कि वे डीजे के बजाय मराठी धार्मिक गीतों, पारंपरिक संगीत, भजन-कीर्तन और भावगीतों को प्राथमिकता दें, ताकि उत्सव का वास्तविक स्वरूप बना रहे।

Why This Matters

BozokMedia analysis shows that this move is a strategic attempt to balance cultural exuberance with urban livability. In a densely populated metropolis like Mumbai, noise pollution during festivals often leads to severe health issues for senior citizens and infants. By shifting the focus from 'loudness' to 'tradition', the committee is attempting to reclaim the spiritual essence of the festival from commercialized noise.

ध्वनि की तीव्रता को समझाने के लिए अध्यक्ष दहिबाल्करे ने एक दिलचस्प उदाहरण दिया। उन्होंने बताया कि जब पेड़ की एक टहनी पर छह कौवे एक साथ शोर मचाते हैं, तो उसकी तीव्रता लगभग 55 डेसिबल होती है। उन्होंने मंडलों से आग्रह किया कि वे इस उदाहरण से शोर की गंभीरता को समझें और मर्यादा का पालन करें।

"उत्सव की भव्यता शोर में नहीं, बल्कि भक्ति और परंपरा की शुद्धता में निहित है।"

ध्वनि प्रदूषण के अलावा, समिति ने मूर्तियों की ऊंचाई और प्रबंधन को लेकर भी कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए हैं। समिति का मानना है कि राज्य सरकार और नगर निगम को विशेषज्ञों की एक समिति नियुक्त करनी चाहिए जो मूर्तियों की अधिकतम ऊंचाई तय करे, ताकि मंडलों के बीच अनावश्यक प्रतिस्पर्धा समाप्त हो सके।

समिति ने सुरक्षा और नागरिक सुविधाओं पर भी विशेष ध्यान देने को कहा है। बड़े पंडालों में सीसीटीवी कैमरे और सुरक्षा गार्डों की तैनाती अनिवार्य करने का सुझाव दिया गया है। साथ ही, महिला भक्तों के लिए अलग कतार और स्वच्छता के लिए मोबाइल शौचालयों की व्यवस्था करने पर जोर दिया गया है। महाप्रसाद की गुणवत्ता और स्वच्छता सुनिश्चित करने के निर्देश भी दिए गए हैं।

क्या आप जानते हैं?: डेसिबल (dB) ध्वनि की तीव्रता मापने की इकाई है; 85 डेसिबल से अधिक का शोर लंबे समय तक सुनने पर स्थायी बहरापन पैदा कर सकता है।
विवरणदिन की सीमारात की सीमा
ध्वनि स्तर (Decibels)55 dB45 dB

Frequently Asked Questions

1. समन्वय समिति ने डीजे का विरोध क्यों किया है?
समिति का मानना है कि डीजे का शोर उत्सव की पवित्रता को कम करता है और यह कानूनी ध्वनि सीमाओं का उल्लंघन करता है।

2. मूर्तियों की ऊंचाई के संबंध में समिति का क्या सुझाव है?
समिति चाहती है कि सरकार और बीएमसी विशेषज्ञों की मदद से एक मानक ऊंचाई तय करें ताकि राजनीतिक या सामाजिक प्रतिस्पर्धा को रोका जा सके।