एक विस्तृत विश्लेषण कि कैसे पाकिस्तान सेना ने 'आतंकवाद के खिलाफ युद्ध' का उपयोग अपनी आंतरिक शक्ति बढ़ाने के लिए किया, जबकि उन्हीं प्रॉक्सीज को शरण दी जो अब उसके अपने अस्तित्व के लिए खतरा हैं।
- पाकिस्तान अमेरिका का फ्रंटलाइन सहयोगी बनने से अब अपने ही घरेलू आतंकवाद से जूझने वाला देश बन गया है।
- सेना ने सोवियत-अफगान युद्ध और 9/11 जैसी भू-राजनीतिक घटनाओं का उपयोग अपनी सत्ता मजबूत करने के लिए किया।
- अमेरिका के साथ 'दोहरे खेल' के कारण ISI को भारत विरोधी आतंकवादी नेटवर्क चलाने की छूट मिली।
- आर्थिक स्थिरता के बजाय सैन्य विस्तार को प्राथमिकता देने से पाकिस्तान आज दिवालियेपन की कगार पर है।
11 सितंबर 2001 की विनाशकारी घटनाओं के 25 साल बाद, पाकिस्तान सेना का इतिहास रणनीतिक अवसरवाद और उसके घातक परिणामों का एक सटीक उदाहरण है। "आग लगाने वाला ही फायरफाइटर बन गया" यह मुहावरा पाकिस्तानी 'डीप स्टेट' की मानसिकता को दर्शाता है: एक ऐसी सैन्य स्थापना जिसने क्षेत्रीय लक्ष्यों के लिए इस्लामी उग्रवाद को हवा दी और बाद में उसी अराजकता से बचाने का दावा किया।
9/11 के बाद वाशिंगटन और इस्लामाबाद के बीच संबंध मजबूरी पर आधारित थे। जब बुश प्रशासन ने पाकिस्तान को "पत्थर युग में भेजने" (बमबारी करने) की धमकी दी, तो परवेज मुशर्रफ ने एक सोची-समझी रणनीति के तहत सहयोग किया। पाकिस्तान ने अमेरिका को संतुष्ट करने के लिए पर्याप्त रियायतें दीं, लेकिन पर्दे के पीछे अपने उग्रवादी प्रॉक्सी नेटवर्क को कभी खत्म नहीं होने दिया।
यह पैटर्न नया नहीं था। जनरल जिया-उल-हक के समय में सोवियत संघ के अफगानिस्तान आक्रमण ने पाकिस्तानी सेना की किस्मत बदल दी थी। CIA के 'ऑपरेशन साइक्लोन' के तहत अरबों डॉलर के हथियार और प्रशिक्षण ISI के माध्यम से मुजाहिदीन तक पहुँचाए गए। जब सोवियत सेना वापस गई, तो इसी बुनियादी ढांचे का उपयोग भारत के खिलाफ पंजाब और जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद फैलाने और तालिबान को खड़ा करने के लिए किया गया।
यह क्यों महत्वपूर्ण है
BozokMedia के विश्लेषण से पता चलता है कि पाकिस्तान सेना के लिए प्रॉक्सी युद्ध एक 'कम लागत' वाला विकल्प था, क्योंकि परमाणु हथियारों की ढाल ने उन्हें सीधे युद्ध के जोखिम से बचा रखा था। हालांकि, इस रणनीति ने एक ऐसा 'राक्षस' पैदा किया जिसे अब नियंत्रित करना असंभव है। लश्कर-ए-तैयबा (LeT) और जैश-ए-मोहम्मद जैसे समूहों को सशक्त बनाकर सेना ने राज्य के कानून को कमजोर किया, और आज वही विचारधारा पाकिस्तान के भीतर ही सेना पर हमले कर रही है।
अमेरिकी युद्ध की सबसे बड़ी रणनीतिक विफलता ISI की पहेली को सुलझाने और अफगानिस्तान में उसके गुप्त हस्तक्षेप को रोकने में अक्षमता थी।
इस पाखंड की पराकाष्ठा 2011 में तब दिखी जब अमेरिकी कमांडोज ने ओसामा बिन लादेन को एबटाबाद में खोज निकाला, जो पाकिस्तान मिलिट्री एकेडमी (काकुल) के बिल्कुल पास रह रहा था। इस खुलासे ने 'फ्रंटलाइन सहयोगी' के मुखौटे को उतार दिया और दुनिया को दिखा दिया कि सैन्य नेतृत्व और वैश्विक आतंकी नेटवर्क के बीच कितना गहरा संबंध था।
वर्तमान में, जनरल असीम मुनीर के नेतृत्व में सेना अपने पूर्ववर्तियों की इसी विरासत से जूझ रही है। देश की आर्थिक बदहाली का सीधा कारण यह है कि वहां 'विकास राज्य' के बजाय 'सुरक्षा राज्य' (Security State) को प्राथमिकता दी गई। भू-राजनीतिक लाभ से बनाया गया सेना का व्यावसायिक साम्राज्य अब एक ढहती अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए पर्याप्त नहीं है।
| युग | मुख्य भू-राजनीतिक कारण | सैन्य उद्देश्य | परिणाम |
|---|---|---|---|
| जिया युग | सोवियत-अफगान युद्ध | USSR को रोकना / मुजाहिदीन बनाना | इस्लामी उग्रवाद का उदय |
| मुशर्रफ युग | 9/11 हमले | अमेरिकी सहायता / क्षेत्रीय वर्चस्व | दोहरा खेल / रणनीतिक विफलता |
| मुनीर युग | अमेरिकी वापसी के बाद | आंतरिक अस्तित्व / आर्थिक संकट | प्रॉक्सीज का उल्टा असर (Blowback) |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1: 'ऑपरेशन साइक्लोन' क्या था?
यह एक CIA कार्यक्रम था जिसने सोवियत संघ के खिलाफ लड़ने के लिए पाकिस्तान की ISI के माध्यम से अफगानिस्तान में मुजाहिदीन को वित्तपोषित और सशस्त्र किया था।
प्रश्न 2: पाकिस्तान सेना को 'आग लगाने वाला' क्यों कहा गया है?
क्योंकि उसने अपनी विदेश नीति के औजार के रूप में आतंकवादी समूहों को पाला-पोसा, जो अंततः उसकी अपनी सीमाओं के भीतर आतंकवाद का कारण बने।