प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 1893 के विश्व धर्म संसद में स्वामी विवेकानंद के कालजयी संबोधन का स्मरण करते हुए उनके वैश्विक प्रभाव और मानवतावादी दृष्टिकोण पर प्रकाश डाला।

  • पीएम मोदी ने स्वामी विवेकानंद के 1893 के शिकागो भाषण के महत्व को रेखांकित किया।
  • संबोधन में सार्वभौमिक भाईचारे और धार्मिक सहिष्णुता का संदेश निहित था।
  • विवेकानंद के विचारों को आधुनिक भारत के निर्माण के लिए प्रेरणास्रोत बताया गया।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में 1893 में शिकागो में आयोजित 'विश्व धर्म संसद' (World Parliament of Religions) में स्वामी विवेकानंद द्वारा दिए गए ऐतिहासिक संबोधन को याद किया। प्रधानमंत्री ने इस बात पर जोर दिया कि कैसे विवेकानंद के शब्दों ने न केवल पश्चिम में भारत की छवि को बदला, बल्कि पूरी दुनिया को शांति और सह-अस्तित्व का एक नया मार्ग दिखाया।

स्वामी विवेकानंद का वह भाषण, जिसकी शुरुआत "मेरे अमेरिकी भाइयों और बहनों" (Sisters and Brothers of America) से हुई थी, आज भी वैश्विक स्तर पर सबसे प्रभावशाली भाषणों में गिना जाता है। प्रधानमंत्री ने उल्लेख किया कि विवेकानंद ने जिस साहस और स्पष्टता के साथ हिंदू धर्म के सार और वेदांत के दर्शन को प्रस्तुत किया, उसने दुनिया को यह सिखाया कि सत्य एक है, लेकिन उस तक पहुँचने के रास्ते अलग-अलग हो सकते हैं।

Why This Matters

BozokMedia analysis shows that the Prime Minister's frequent references to Swami Vivekananda are not merely nostalgic, but a strategic effort to align India's current global diplomacy with the philosophy of 'Vasudhaiva Kutumbakam' (The World is One Family). By invoking Vivekananda, India is projecting itself as a 'Vishwa Guru'—a global teacher of peace and spirituality.

स्वामी विवेकानंद का शिकागो संबोधन केवल एक धार्मिक व्याख्यान नहीं था, बल्कि यह वैश्विक स्तर पर सांस्कृतिक कूटनीति का पहला बड़ा भारतीय उदाहरण था।

ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखें तो, 19वीं सदी के अंत में जब भारत औपनिवेशिक शासन के अधीन था, तब विवेकानंद ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत के बौद्धिक और आध्यात्मिक गौरव को पुनर्स्थापित किया। उन्होंने कट्टरता और संकीर्णता पर प्रहार करते हुए सार्वभौमिक स्वीकार्यता का आह्वान किया, जो आज के ध्रुवीकृत युग में और भी अधिक प्रासंगिक हो गया है।

प्रधानमंत्री ने यह भी साझा किया कि विवेकानंद के विचार युवाओं के लिए ऊर्जा का स्रोत हैं। उनका मानना था कि शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो चरित्र का निर्माण करे और मनुष्य को अपने पैरों पर खड़ा होना सिखाए। यही दृष्टिकोण वर्तमान की 'नई शिक्षा नीति' और 'स्किल इंडिया' जैसे अभियानों में भी झलकता है।

क्या आप जानते हैं?: स्वामी विवेकानंद ने शिकागो संसद में प्रवेश करने से पहले अपनी घबराहट को दूर करने के लिए ध्यान लगाया था, और उनके पहले शब्दों ने ही पूरी सभा को मंत्रमुग्ध कर दिया था।

Frequently Asked Questions

प्रश्न 1: स्वामी विवेकानंद ने शिकागो भाषण कब दिया था?
उत्तर: स्वामी विवेकानंद ने यह ऐतिहासिक संबोधन सितंबर 1893 में विश्व धर्म संसद के दौरान दिया था।

प्रश्न 2: इस भाषण का मुख्य संदेश क्या था?
उत्तर: इस भाषण का मुख्य संदेश सार्वभौमिक भाईचारा, धार्मिक सहिष्णुता और सभी धर्मों की एकता था।