तमिलनाडु के मंजोलाई-मेगामलाई क्षेत्र में निवासियों की बेदखली के खिलाफ विभिन्न राजनीतिक दलों ने मोर्चा खोल दिया है। नेताओं ने सरकार पर वन्यजीव संरक्षण की आड़ में निजी रिसॉर्ट्स के लिए जमीन खाली कराने का गंभीर आरोप लगाया है।
- मंजोलाई-मेगामलाई क्षेत्र में सदियों से रह रहे परिवारों को बेदखल किए जाने का विरोध।
- नेताओं ने आरोप लगाया कि 'टाइगर कंजर्वेशन' केवल एक बहाना है, असल मकसद निजी रिसॉर्ट्स बनाना है।
- नाम तमिलर कतची, AMMK और पुथिया तमिलगम जैसे दलों ने स्थानीय लोगों के अधिकारों की मांग की।
तमिलनाडु के मंजोलाई-मेगामलाई क्षेत्र में प्रशासन द्वारा की जा रही बेदखली की कार्रवाई ने अब एक बड़े राजनीतिक विवाद का रूप ले लिया है। शनिवार को साउथ इंडिया फॉरवर्ड ब्लॉक द्वारा आयोजित एक विशाल प्रदर्शन में राज्य के प्रमुख राजनीतिक नेताओं ने हिस्सा लिया और सरकार की नीतियों की कड़ी आलोचना की। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि जिन परिवारों को आज 'अतिक्रमणकारी' कहा जा रहा है, वे एक सदी से अधिक समय से इस मिट्टी पर रह रहे हैं।
नाम तमिलर कतची के मुख्य समन्वयक सीमन ने इस मुद्दे को तमिल समुदाय के ऐतिहासिक संघर्ष से जोड़ते हुए कहा कि विकास के नाम पर स्थानीय लोगों को हमेशा बलि का बकरा बनाया जाता है। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि यह क्षेत्र वन भूमि है, तो उन मजदूरों का क्या होगा जिन्हें 1910 में यहाँ लाया गया था? सीमन ने तर्क दिया कि पूर्वजों की जमीन खोना सबसे गहरा दुख है और सरकार को केवल जंगलों को नहीं, बल्कि वहां रहने वाले इंसानों को भी बचाना चाहिए।
वहीं, AMMK नेता टी.टी.वी. dhinakaran ने इस बात पर जोर दिया कि मेगामलाई क्षेत्र के 98 से अधिक गांवों ने पूर्व मुख्यमंत्री जयललिता के शासनकाल में काफी प्रगति की थी। उन्होंने बताया कि इस क्षेत्र की लगभग 90% आबादी हाशिए पर रहने वाले समुदायों से आती है। उन्होंने तमिलनाडु सरकार से तत्काल प्रभाव से बेदखली की प्रक्रिया रोकने और भूमि को उसके वास्तविक मालिकों को वापस करने की मांग की।
Why This Matters
BozokMedia analysis shows that this conflict is not merely about land titles but represents a systemic clash between state-led environmental conservation and indigenous livelihood rights. The pattern of displacing marginalized communities under the guise of 'eco-tourism' or 'wildlife protection' is becoming a recurring theme in the Western Ghats, leading to deep-seated social unrest.
"The displacement of ancestral populations under the pretext of conservation, without a comprehensive rehabilitation plan, is a violation of fundamental human rights."
पुथिया तमिलगम के संस्थापक के. कृष्णसामी ने एक दर्दनाक इतिहास को याद करते हुए बताया कि 1998 में मंजोलाई निवासियों के लिए किए गए एक विरोध प्रदर्शन में एक साल के बच्चे सहित 17 लोगों की जान चली गई थी। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार 'बाघ संरक्षण' का दावा कर रही है, जबकि वास्तविकता यह है कि इन क्षेत्रों में बाघ नहीं बल्कि केवल तेंदुए पाए जाते हैं।
कृष्णसामी ने आगे दावा किया कि सरकार का असली उद्देश्य वन भूमि को निजी संस्थाओं को सौंपना है ताकि वहां महंगे और मुनाफे वाले रिसॉर्ट्स बनाए जा सकें। उन्होंने स्पष्ट किया कि वह सुप्रीम कोर्ट तक अपनी कानूनी लड़ाई जारी रखेंगे जब तक कि अंतिम निवासी को उसकी आजीविका का अधिकार नहीं मिल जाता।
Frequently Asked Questions
प्रश्न 1: मंजोलाई-मेगामलाई बेदखली का मुख्य कारण क्या बताया जा रहा है?
आधिकारिक तौर पर इसे बाघ संरक्षण (Tiger Conservation) और वन भूमि की सुरक्षा बताया जा रहा है, लेकिन विपक्षी दलों का आरोप है कि यह निजी रिसॉर्ट्स के लिए रास्ता बनाने की साजिश है।
प्रश्न 2: इस विरोध प्रदर्शन में कौन-कौन से प्रमुख दल शामिल थे?
इसमें नाम तमिलर कतची, AMMK, पुथिया तमिलगम और साउथ इंडिया फॉरवर्ड ब्लॉक जैसे प्रमुख राजनीतिक दल शामिल थे।