पुणे की एक अदालत ने ऐतिहासिक जयस्तंभ और उससे सटी 9.25 एकड़ जमीन पर जमादार-मालवड़कर परिवार के स्थायी कब्जे की अनुमति दे दी है, जिससे एक लंबे समय से चले आ रहे कानूनी विवाद का अंत हुआ है।

  • पुणे कोर्ट ने जमादार-मालवड़कर परिवार के पक्ष में स्थायी कब्जे का आदेश दिया।
  • विवादित जमीन पेर्न गांव में स्थित है और इसका क्षेत्रफल 9.25 एकड़ है।
  • कोर्ट ने राज्य सरकार को उचित कानूनी प्रक्रिया के बिना परिवार को बेदखल करने से रोका है।

पुणे की एक अदालत ने शुक्रवार को एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाते हुए हवेली तालुका के पेर्न गांव में स्थित जयस्तंभ और उससे सटी लगभग 9.25 एकड़ जमीन पर जमादार-मालवड़कर परिवार के स्थायी कब्जे को मंजूरी दे दी है। संयुक्त सिविल जज (वरिष्ठ प्रभाग) अमोल शिंदे ने इस संबंध में आदेश पारित किया, जिससे इस संवेदनशील ऐतिहासिक स्थल से जुड़े मालिकाना हक के विवाद पर विराम लगा है।

ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार, जयस्तंभ एक सैन्य स्मारक है जिसे ब्रिटिश सरकार ने 1822 में उन सैनिकों की याद में बनवाया था, जिन्होंने 1 जनवरी 1818 को कोरेगांव भीमा की लड़ाई में पेशवाओं के खिलाफ युद्ध लड़ा था। 13 दिसंबर 1824 को, अंग्रेजों ने इस स्मारक का प्रभार कांदोजीबिन गजोजी जमादार को सौंपा था, जो इस युद्ध में घायल हुए थे। ब्रिटिश सरकार ने उन्हें एक 'सनद' (आधिकारिक आदेश) प्रदान की थी, जिसके तहत उनके परिवार को पुरुष उत्तराधिकारियों की मौजूदगी तक जयस्तंभ और आसपास की लगभग 260 एकड़ जमीन का कब्जा दिया गया था।

यह मामला क्यों महत्वपूर्ण है?

BozokMedia के विश्लेषण के अनुसार, यह मामला केवल जमीन के टुकड़े का नहीं, बल्कि पहचान और इतिहास के दावों का है। जयस्तंभ महाराष्ट्र में एक अत्यंत संवेदनशील स्थल है। एक ओर जहां दलित-अंबेडकरवादी इसे जातिवाद के खिलाफ जीत और 'शौर्य दिवस' के रूप में मनाते हैं, वहीं जमादार परिवार (जो मराठा समुदाय से है) का तर्क है कि इस युद्ध में विभिन्न जातियों के सैनिक शामिल थे, इसलिए इसे किसी एक जाति से नहीं जोड़ा जाना चाहिए।

ऐतिहासिक सनद और ब्रिटिश काल के दस्तावेज़ों की कानूनी वैधता ने इस मामले में निर्णायक भूमिका निभाई है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि राजस्व रिकॉर्ड के ऊपर मूल कानूनी अनुदान को प्राथमिकता दी गई है।

इस कानूनी लड़ाई की शुरुआत सितंबर 2015 में हुई जब 'भीमा कोरेगांव विजय स्तंभ संरक्षण और संवर्धन समिति' ने आरोप लगाया कि जमादार परिवार का नाम जमीन के 7/12 एक्सट्रैक्ट में अवैध रूप से दर्ज है। समिति ने मांग की थी कि इस जमीन को खाली कराया जाए ताकि 1 जनवरी को आने वाले लाखों अनुयायियों को जगह मिल सके। इसके जवाब में, कैप्टन बालासाहेब जमादार-मालवड़कर और उनके परिजनों ने 2017 में महाराष्ट्र सरकार और BARTI के खिलाफ दीवानी मुकदमा दायर किया था।

मामले की सुनवाई के दौरान, बॉम्बे हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट को इस मामले का जल्द निपटारा करने का निर्देश दिया था। शुक्रवार को कोर्ट ने स्पष्ट किया कि प्रतिवादी (राज्य सरकार) अब जमादार परिवार के कब्जे में हस्तक्षेप नहीं कर सकता और बिना उचित कानूनी प्रक्रिया के उन्हें बेदखल नहीं किया जा सकता।

पक्ष मुख्य तर्क/दावा आधार
जमादार परिवार स्थायी मालिकाना हक और कब्जा 1824 की ब्रिटिश सनद और दस्तावेज़
संरक्षण समिति सार्वजनिक उपयोग और अतिक्रमण हटाना भीमा कोरेगांव का सामाजिक-ऐतिहासिक महत्व
क्या आप जानते हैं?: जयस्तंभ को 1822 में ब्रिटिश सैनिकों की याद में बनाया गया था, लेकिन आज यह लाखों लोगों के लिए सामाजिक गौरव और प्रतिरोध का प्रतीक बन चुका है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. कोर्ट ने किस आधार पर जमादार परिवार के पक्ष में फैसला सुनाया?
कोर्ट ने 1824 की ब्रिटिश सनद और अन्य ऐतिहासिक दस्तावेजों को स्वीकार किया, जो परिवार के कब्जे को प्रमाणित करते थे।

p>2. क्या यह फैसला जयस्तंभ के सार्वजनिक दर्शन को प्रभावित करेगा?
कोर्ट का आदेश मुख्य रूप से जमीन के कब्जे और बेदखली से संबंधित है; सार्वजनिक दर्शन के नियमों पर कोई सीधा प्रतिबंध नहीं लगाया गया है।