हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड सहित छह राज्यों ने लंबे समय से लंबित 660 मेगावाट की किशौ बहुउद्देशीय परियोजना के लिए समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए हैं। केंद्र सरकार के हस्तक्षेप से इस ₹15,000 करोड़ के प्रोजेक्ट का रास्ता साफ हो गया है।

  • 660 मेगावाट क्षमता वाला किशौ बांध प्रोजेक्ट अब आधिकारिक रूप से शुरू होगा।
  • केंद्र सरकार प्रोजेक्ट की कुल लागत का 90% हिस्सा वहन करेगी।
  • हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में भूमि डूबने और विस्थापन की गंभीर समस्या थी।
  • दिल्ली, हरियाणा और राजस्थान जैसे राज्यों को पानी और बिजली का लाभ मिलेगा।

नई दिल्ली में एक ऐतिहासिक बैठक के दौरान, छह राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने किशौ बहुउद्देशीय परियोजना के लिए एक महत्वपूर्ण समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए। इस अवसर पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सीआर पाटिल की उपस्थिति ने इस परियोजना की रणनीतिक महत्ता को रेखांकित किया। इस समझौते में हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू, उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी, राजस्थान के मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा और दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता शामिल रहीं।

किशौ परियोजना क्या है?
यह परियोजना टोंस नदी पर स्थित एक विशाल बांध है, जो यमुना की एक प्रमुख सहायक नदी है। यह बांध हिमाचल प्रदेश के सिरमौर और उत्तराखंड के देहरादून जिलों की सीमा पर बनाया जा रहा है। 236 मीटर ऊंचे कंक्रीट ग्रेविटी बांध के माध्यम से 660 मेगावाट बिजली पैदा करने का लक्ष्य रखा गया है। इसके अलावा, यह लगभग 97,076 हेक्टेयर भूमि की सिंचाई करने और 617 मिलियन क्यूबिक मीटर पेयजल और औद्योगिक जल उपलब्ध कराने में सक्षम होगा।

Why This Matters

BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि यह समझौता केवल एक बुनियादी ढांचा परियोजना नहीं है, बल्कि उत्तर भारत की जल सुरक्षा के लिए एक गेम-चेंजर है। दशकों से लागत साझा करने और लाभों के वितरण को लेकर राज्यों के बीच खींचतान चल रही थी, जिसे केंद्र के हस्तक्षेप ने सुलझा दिया है।

केंद्र सरकार द्वारा 90% लागत वहन करने का निर्णय इस परियोजना की सफलता के लिए सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हुआ है।

देरी का मुख्य कारण और समाधान:
पिछले आठ वर्षों से हिमाचल प्रदेश इस परियोजना के वित्तीय बोझ को लेकर चिंतित था। राज्य सरकार का तर्क था कि बांध के कारण भारी मात्रा में भूमि जलमग्न होगी और हजारों लोग विस्थापित होंगे, जबकि इसका मुख्य लाभ दिल्ली, हरियाणा और राजस्थान जैसे निचले राज्यों को मिलेगा। 2020 की एक व्यवहार्यता रिपोर्ट के अनुसार, लगभग 2,950 हेक्टेयर भूमि डूबने की आशंका है और 17 गांवों के लगभग 5,498 लोग प्रभावित हो सकते हैं।

नया वित्तीय ढांचा:
जून 2026 में केंद्र सरकार ने एक क्रांतिकारी प्रस्ताव दिया, जिसमें सरकार 90% लागत उठाएगी और बाकी 10% छह राज्य मिलकर वहन करेंगे। इस नए समझौते के तहत, हिमाचल प्रदेश को बिना भारी पूंजी निवेश के सालाना लगभग ₹600 करोड़ का आर्थिक लाभ मिलेगा। साथ ही, बिजली घटक की लागत दिल्ली, राजस्थान और हरियाणा द्वारा वहन की जाएगी, जिसके बदले हिमाचल को पानी का हिस्सा मिलेगा।

Did You Know?: टोंस नदी को यमुना की सबसे महत्वपूर्ण सहायक नदियों में से एक माना जाता है, और इस पर बना बांध उत्तर भारत के जल संकट को हल करने की क्षमता रखता है।
विशेषतापुरानी योजनानई योजना (MoU 2026)
केंद्र की हिस्सेदारीन्यूनतम/अस्पष्ट90% लागत
राज्यों की हिस्सेदारीअधिक वित्तीय बोझकेवल 10% साझा लागत
हिमाचल का लाभवित्तीय जोखिम अधिक₹600 करोड़ वार्षिक आर्थिक लाभ

Frequently Asked Questions

1. किशौ परियोजना से किन राज्यों को सबसे ज्यादा लाभ होगा?
मुख्य रूप से दिल्ली, हरियाणा और राजस्थान को पानी की आपूर्ति का लाभ मिलेगा, जबकि हिमाचल और उत्तराखंड को बिजली और राजस्व प्राप्त होगा।

2. इस परियोजना से कितने लोग प्रभावित होंगे?
अनुमान के अनुसार, लगभग 5,498 लोग और 17 गांव विस्थापित हो सकते हैं।