मोदी के शपथ ग्रहण के 12 साल बाद, दिल्ली के छात्रों ने प्रधानमंत्री के इस्तीफे की मांग की, जिससे शिक्षा सुधार का संघर्ष राष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक उथल‑पुथल में बदल गया। कॉकरॉच जनता पार्टी के नेतृत्व में यह आंदोलन पुलिस की हिंसा और सरकार की असहयोग को उजागर करता है।
मुख्य बिंदु
- छात्रों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के इस्तीफे की मांग की
- पुलिस की कठोर कार्रवाई ने विरोध को और तेज़ कर दिया
- प्रदर्शन दिल्ली से लेकर पूरे भारत में फैल गया
विरोध का प्रारम्भिक चरण
22 जुलाई, 2026 को नई दिल्ली के जंतर मान्तर में कॉकरॉच जनता पार्टी (CJP) के नेतृत्व में छात्रों ने शिक्षा सुधार और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की माँग की। जलती हुई बारिश, जलती हुई गैस और पेललेट गोलियों के बीच, छात्रों ने अपना कैंप स्थापित कर दिया, जिसने पूरे देश की नज़रें खींच लीं।
मांगों का विस्तार
प्रारंभिक मांगों के बाद, छात्र अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के इस्तीफे की भी माँग कर रहे हैं। सरकार ने परीक्षा लीकेज मामलों के लिये फास्ट‑ट्रैक कोर्ट की घोषणा की, लेकिन पुलिस द्वारा प्रदर्शनकारियों पर अत्यधिक बल प्रयोग के लिए कोई माफी या जांच का वादा नहीं किया।
सरकारी प्रतिक्रिया और नई उभरी लहर
सरकार ने हड़ताल पर पड़े सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक को 21 वें दिन जबरन अस्पताल ले जाया, जिससे छात्रों का समर्थन और बढ़ा। बिना किसी संगठन के बुलाए हुए लोग भी संसद तक पहुँचने की कोशिश में धारा में शामिल हो गए, जिससे दिल्ली की सड़कों पर अराजकता छा गई।
पुलिस द्वारा हिंसा और राष्ट्रीय स्तर पर विस्तार
पुलिस ने पेललेट गन, तेज़ी से इकट्ठा किए गए बैटन और धुआँ बिखेरते हुए कम से कम 200 लोगों को घायल किया। इस हिंसा ने विपक्षी दलों को भी अपने स्वयं के प्रदर्शन में शामिल किया, जिससे विरोध का दायरा पटना, मुंबई, गोवा तक फैला। किसान, आत्महत्या करने वाले छात्रों के परिवार और कई नागरिक इस आंदोलन में शामिल हो गए।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
2019 में नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) के विरोध में भी देशव्यापी आंदोलन हुआ था, जिसे कोविड‑19 महामारी ने अचानक समाप्त कर दिया था। उसी तरह, 2020 के लॉकडाउन, 2021 के किसान आंदोलन और 2022 के मैनिपुर हिंसा ने पहले ही मोदी सरकार की वैधता पर सवाल खड़े किए थे। आज का छात्र आंदोलन इन सभी मुद्दों का संगम बन चुका है।
Why This Matters
BozokMedia analysis shows that the scale of student mobilisation signals a profound shift in Indian civil society, where fear is no longer a tool of suppression but a catalyst for collective action against perceived authoritarianism.
"यदि सरकार इस विरोध को ठंडे दिमाग से नहीं संभालती, तो यह राष्ट्रीय राजनीति की दिशा को मूलभूत रूप से बदल सकता है," प्रमुख राजनीतिक विश्लेषक डॉ. अजय सिंह ने कहा।
Frequently Asked Questions
प्रश्न 1: छात्र किन विशिष्ट शिक्षा सुधारों की माँग कर रहे हैं?
विस्तार: वे परीक्षा लीक को रोकने के लिए सख्त निगरानी, ऑनलाइन परीक्षा प्रणाली का पुनर्विचार और अधिक पारदर्शी परिणाम घोषणा की माँग कर रहे हैं।
प्रश्न 2: सरकार ने इस आंदोलन पर अब तक क्या कदम उठाए हैं?
विस्तार: सरकार ने फास्ट‑ट्रैक कोर्ट की घोषणा की है, लेकिन किसी भी पुलिस कर्मी की जांच या छात्र नेता के खिलाफ जबरन अस्पतालीकरण को लेकर कोई स्पष्ट बयान नहीं दिया है।