केरल हाई कोर्ट ने SNDP योगम के 15.85 करोड़ रुपये के माइक्रोफाइनेंस घोटाले की जांच में अधिकारी को अंतिम महीने की छूट दी। राज्य सरकार ने कोर्ट को बताया कि जांचकर्ता ने ईमानदार प्रयास किए हैं, परंतु रिपोर्ट तैयार करने के लिये अतिरिक्त समय आवश्यक है।
केरल हाई कोर्ट ने बुधवार को एक महत्वपूर्ण आदेश जारी किया, जिसमें Sree Narayana Dharma Paripalana (SNDP) योगम से जुड़े 15.85 करोड़ रुपये के alleged माइक्रोफाइनेंस घोटाले की जाँच में वर्तमान जांच अधिकारी को "अंतिम और अंतिम मौका" के रूप में एक अतिरिक्त माह का समय दिया गया। यह निर्णय M.S. अनिल (चेर्तला) द्वारा दायर याचिका के बाद आया, जिसमें उन्होंने व्यापक वैधता जांच की माँग की थी।
पृष्ठभूमि और केस का इतिहास
यह केस 2016 में दर्ज हुआ था, जब 2003 से 2014 के बीच SNDP योगम के माध्यम से राज्य सरकार द्वारा प्रदान किए गए ऋणों के दुरुपयोग के आरोप लगे। यह माइक्रोफाइनेंस योजना विशेष रूप से हाशिए पर रहने वाले समुदायों के आर्थिक सशक्तिकरण के उद्देश्य से शुरू की गई थी, परंतु बाद में निधियों के ग़लत उपयोग की खबरें सामने आईं। नवंबर 2024 में इस जांच को स. सासिधरन को सौंपा गया था।
न्यायालय का आदेश और सरकार की प्रतिक्रिया
न्यायमूर्ति A. Badharudeen को भेजे गए सरकारी ब्रीफ़ में कहा गया कि जांच अधिकारी ने "बोना फाइड" प्रयास किए हैं, परंतु पूरी जाँच को अंतिम रूप देने के लिये उसे अतिरिक्त एक माह की आवश्यकता है। कोर्ट ने इस ब्रीफ़ को स्वीकार कर, अधिकारी को एक महीने का "अंतिम मौका" दिया, जिससे वह अंतिम रिपोर्ट तैयार कर सके।
आरोपी का पक्ष और नई नियुक्ति की मांग
आरोपी पक्ष ने एक अलग आवेदन दायर किया, जिसमें उन्होंने वर्तमान जांच अधिकारी स. सासिधरन को बदलने की मांग की। उनका तर्क था कि सासिधरन को कई बार विस्तार दिया गया, जिससे जांच में देरी और आरोपियों को फायदा हुआ। उन्होंने जयंथ जगेनाथ, वर्तमान में मानवाधिकार आयोग में डिप्टी इंस्पेक्टर जनरल, को नई नियुक्ति के लिए प्रस्तावित किया।
भविष्य की संभावनाएँ और राष्ट्रीय प्रभाव
केरल में वर्तमान में 124 मामलों की जांच लंबित है, जबकि केवल एक केस में अंतिम रिपोर्ट प्रस्तुत की गई है। यह आदेश न केवल SNDP केस की दिशा तय करेगा, बल्कि राज्य में न्यायिक प्रक्रियाओं की पारदर्शिता और त्वरित निष्पादन के लिए एक मिसाल स्थापित कर सकता है। यदि नई रिपोर्ट में वित्तीय दुरुपयोग के ठोस प्रमाण मिलते हैं, तो यह राष्ट्रीय स्तर पर माइक्रोफाइनेंस नियमन और निगरानी में सुधार की मांग को बल देगा।