जसवंत सिंह खल्रा की 1995 की हत्या में प्रमुख गवाह किक्कर सिंह ने बताया कि वह जेल में खल्रा को रोटी खिलाते समय उनके शरीर पर गहरी चोटें थीं। पुलिस के दबाव और परिवार को खतरे का सामना करने के बाद वह गवाही बदलने के लिए मजबूर हुए, पर आज वह लुधियाना में सुरक्षित हैं।

पृष्ठभूमि और खल्रा की भूमिका

जसवंत सिंह खल्रा, 42 वर्ष के मानवाधिकार कार्यकर्ता, 1990 के दशक में पंजाब पुलिस द्वारा किए गए फर्जी फांसीयों और सिख युवाओं की गायबियों की जांच में प्रमुख भूमिका निभाते थे। उनके स्वतंत्र अनुसंधान ने कई अनसुलझे मामलों को उजागर किया, जिससे पुलिस पर दबाव बढ़ा और अंततः उन्हें 6 सितंबर 1995 को अमृतसर से अपहरण कर लिया गया।

किक्कर सिंह की पहली गवाही

किक्कर सिंह, 53 वर्ष के निवासी, 24 अक्टूबर 1995 को तारण तारन के कांग पुलिस स्टेशन में खल्रा से मिलते हैं। उन्होंने बताया कि खल्रा अत्यधिक चोटिल थे, उनके हाथ मुँह तक नहीं पहुँच पा रहे थे, और उन्होंने अपने हाथों से उन्हें रोटी खिलाई। इस दौरान खल्रा ने कहा, “जल्लादन दे वस पए हैं, जो मरजी कर लैन” – यानी वे अत्याचारी हाथों में फँस चुके थे।

गवाही बदलने के कारण

प्रारम्भ में किक्कर सिंह ने अपनी गवाही सीबीआई के समक्ष दर्ज कराई, लेकिन पुलिस ने उनके परिवार को लगातार धमकाया। उनके भाई को भी झूठे मामलों में फँसाया गया, और कई बार उनके घर पर छापे मारे गए। इस दबाव के कारण किक्कर सिंह ने “हॉस्टाइल” हो कर गवाही बदल दी, यह दावा किया कि पुलिस उनके और उनके परिवार को सताती रही।

वर्तमान स्थिति और नई जानकारी

किक्कर सिंह ने हाल ही में पुष्टि की कि वह लुधियाना में जीवित हैं और कोई “गायब” नहीं हैं। उन्होंने कहा कि फिल्म ‘सतलुज’ के कारण सरकार ने उनके बयान को दबाने की कोशिश की, पर उन्होंने फिल्म निर्माताओं से कोई संपर्क नहीं किया। किक्कर सिंह को न्यायिक जांच द्वारा पुलिस की हिरासत में उनके अनुभव की पुष्टि मिली है, और उन्हें कोर्ट के आदेश पर पुलिस सुरक्षा भी दी गई है।

भविष्य के प्रभाव

किक्कर सिंह की नई गवाही न केवल 1995 की घटना को फिर से उजागर करती है, बल्कि आज भी पुलिस की अत्याचार और गवाहों पर दबाव के मुद्दे को भी सामने लाती है। यह मामला मानवाधिकार संगठनों और न्यायालयों के लिए एक चेतावनी बन सकता है कि ऐतिहासिक अन्याय को पुनः जांचा और सच्चाई को स्थापित किया जाए।